लखनऊ (जेएनएन)। राज्यसभा की दस सीटों के लिए हो रहे चुनाव में भाजपा की आठ और सपा की एक सीट पक्की है लेकिन, दसवीं सीट के लिए भाजपा की दावेदारी ने पहले के समीकरण ध्वस्त कर दिये हैं। यूं तो भाजपा के 11 उम्मीदवार मैदान में हैं लेकिन, प्रदेश अध्यक्ष डॉ. महेंद्र नाथ पांडेय का कहना है कि चुनाव में नौ ही रहेंगे। दो का नाम वापस हो जाएगा। भाजपा के पास अतिरिक्त 28 विधायकों के मत बच रहे हैं और उसे जीत के लिए नौ और मतों की जरूरत होगी। इसके लिए भाजपा ने ऐसा चक्रव्यूह रचा है कि विरोधी भी गणित समझ नहीं पा रहे हैं।

विधानसभा में सहयोगी दलों समेत इस समय भाजपा के पास 324 (बिजनौर के नूरपुर के भाजपा विधायक लोकेंद्र सिंह के निधन से एक संख्या घटी) हैं। एक सीट के लिए औसत 37 विधायकों के मत की जरूरत है। सदन में निर्दलीय रघुराज प्रताप सिंह और अमन मणि त्रिपाठी तथा निषाद के विजय मिश्रा हैं। भाजपा के एक दिग्गज इन तीनों मतों पर अपना ही दावा करते हैं। यह माना जा रहा है कि रघुराज प्रताप सिंह अगर भाजपा के पक्ष में हुए तो कई विधायकों को अपने साथ जोड़ सकते हैं।

दसवीं सीट पर होगी टसल

राज्यसभा चुनाव की शुरुआत में सपा और बसपा के साथ गठबंधन के बाद नई सियासी पारी शुरू हुई। सपा ने जया बच्चन को उम्मीदवार बनाया और बसपा को समर्थन देने का एलान किया। बसपा की ओर से भीम राव अम्बेडकर उम्मीदवार बनाये गए। कांग्रेस ने भी भीम राव को समर्थन देने की घोषणा कर दी। अगर विधायकों के मत को देखें तो टसल दसवीं सीट पर ही है। जया बच्चन के मत आवंटित करने के बाद सपा के दस वोट बच रहे हैं। बसपा के 19, सपा के दस, कांग्रेस के सात और रालोद के एक वोट मिलाकर कुल 37 हो रहे हैं। सपा-बसपा का दावा है कि उनके वोट पूरे हो रहे हैं लेकिन, इस बीच भाजपा ने सपा सांसद नरेश अग्रवाल को पार्टी में शामिल कर अपना दांव दिखा दिया है।

नरेश के भाजपाई बनते ही बदले समीकरण

सपा महासचिव रहे नरेश अग्रवाल के पुत्र नितिन अग्रवाल सपा के विधायक हैं। नरेश के भाजपाई बनते ही समीकरण बदल गया है। वैसे तो नितिन सोमवार को विधानसभा सत्र में नहीं आये और अभी चुप्पी साधे हैं लेकिन, माना यही जा रहा है कि वह भाजपा खेमे में होंगे। नरेश तो अब भाजपा के खुले पत्ते हैं लेकिन, विपक्ष में कई विधायक भाजपा के पाले में जा सकते हैं। 2016 के विधान परिषद और राज्यसभा के चुनाव में भी भाजपा ने कई दलों में सेंध लगाई और सपा, बसपा और कांग्रेस के कई विधायकों ने उनके उम्मीदवारों को वोट दिये थे। भाजपा अपने उसी पुराने फार्मूले को दोहराने में जुटी है।

एजेंट को वोट दिखाने के नियम से विपक्ष आशान्वित

राज्यसभा चुनाव में विधायक को अपना मतपत्र मतपेटी में डालने से पहले पार्टी के अधिकृत एजेंट को दिखाना पड़ता है। बसपा और सपा अपने एजेंट के जरिये अपने विधायकों का मत देखेंगे। अगर किसी विधायक ने अपना मत नहीं दिखाया तो उसकी सदस्यता को चुनौती दी जा सकती है। राज्यसभा चुनाव में मतदान की इस प्रक्रिया से विपक्ष आशान्वित है, जबकि सूत्रों का कहना है कि भाजपा कुछ दमदार विधायकों को 2019 में लोकसभा चुनाव में उतारने के वादे के साथ अपने पाले में कर सकती है। ऐसे विधायक खुला विद्रोह भी कर सकते हैं। यह स्थिति सत्ता और विपक्ष दोनों तरफ हो सकती है।

भाजपा अपने नेताओं की भी ले रही परीक्षा

भाजपा के 11 उम्मीदवार मैदान में हैं। इनमें दो सलिल विश्नोई और विद्यासागर सोनकर की घोषणा पहले नहीं हुई थी। इनका कहना है कि पार्टी के निर्देश पर ही पर्चा भरे। अब कहा यह भी जा रहा है कि जीत के लिए कम पडऩे वाले मतों का जुगाड़ करने के लिए भी पार्टी अपने नेताओं की परीक्षा ले रही है। इस परीक्षा में उत्तीर्ण होने वाले को संभव है कि मैदान में बने रहने दिया जाए और दूसरे का नाम वापस ले लिया जाए। फिलहाल इसे लेकर अधिकृत तौर पर बयान देने को कोई राजी नहीं है लेकिन, 11 उम्मीदवारों के मैदान में होने के और भी निहितार्थ निकाले जा रहे हैं।

क्रास वोटिंग का खतरा बरकरार

खतरा सिर्फ विपक्ष के लिए ही नहीं है। भाजपा के रणनीतिकार चौतरफा चौकन्ना हैं। भाजपा और सहयोगी दलों के बीच कहीं सेंध न लग जाए, इसलिए भी एक-एक विधायक पर नजर रखी जा रही है। विपक्ष की निगाह भाजपा के कुछ असंतुष्टों के अलावा उनके सहयोगी दलों पर भी है। विधायकों के समूह की निगरानी के लिए पदाधिकारियों और मंत्रियों को जिम्मेदारी भी सौंपी गई है। किस उम्मीदवार को कौन-कौन विधायक वोट देंगे, भाजपा इसका भी आवंटन करेगी।

विधायकों की दलीय स्थिति

दल विधायक

भाजपा 311

अपना दल (एस) 09

सुभासपा 04

सपा 47

बसपा 19

कांग्रेस 07

रालोद 01

निषाद पार्टी 01

निर्दल 03

(अपना दल और सुभासपा भाजपा के सहयोगी दल हैैं। नूरपुर विधायक के निधन के बाद भाजपा विधायकों की संख्या 311 रह गई है) 

Posted By: Ashish Mishra