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आशुतोष मिश्र, लखनऊ। क्रांतिकारी संगठन मातृवेदी के कमांडर इन चीफ गेंदालाल दीक्षित को संगठन में कई नामों से जाना जाता था। इनमें से फूल सबसे ज्यादा प्रसिद्ध था। अंग्रेजों के खिलाफ इस फूल की खुशबू से उठी बगावत की बयार उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान तक फैली। आगरा मुख्यालय से 70 किलोमीटर दूर मई में जन्मे गेंदालाल दीक्षित असल में क्रांतिकारियों के द्रोणाचार्य थे। लालच में पड़े अपनों ने उनकी मुखबिरी न की होती तो शायद बिस्मिल और आजाद जैसे कई क्रांतिकारी बलिवेदी पर बलिदान न होते।

शिक्षक की नौकरी छोड़कर क्रांति की राह चुनने वाले गेंदालाल दीक्षित बेमिसाल शख्सियत के धनी थे। इसीलिए तो उन्होंने मातृवेदी के पांच हजार लड़ाका सैनिक तैयार करने के साथ आजादी के संघर्ष के लिए राजस्थान की खारवा रियासत के 10 हजार सिपाहियों का प्रबंध कर लिया था, लेकिन एक मुखबिरी ने आजादी के इस महानायक का सपना तोड़ दिया। अगर ऐसा न हुआ होता तो सन 1918 में 1857 से बड़ी क्रांति हुई होती। वह क्रांतिकारी दल के लिए फंड जुटाने की खातिर सिरसागंज में अंग्रेजों के पिट्ठू सेठ ज्ञानचंद्र के यहां डकैती डालने पहुंचे थे।

चंबल घाटी में मातृवेदी के संगठनकर्ता ब्रह्मचारी लक्ष्मणानंद, मन्नू राजा और अध्यक्ष दस्युराज पंचम सिंह के साथ भिंड के जंगलों में पहुंचे। दल थकान और भूख से बेजार था। इसी बीच, भारी धन के लालच में भेदिए हिंद सिंह ने तार पर स्पेशल ड्यूटी पुलिस कमिश्नर यंग को इनकी सूचना दे दी। इधर, इनके खाने में हिंद सिंह ने जहर मिला दिया। खाना खाने के दौरान ब्रह्मचारी लक्ष्मणानंद की जबान ऐंठने लगी तो हिंद सिंह पानी लाने के बहाने वहां से भागने की कोशिश करने लगा, लेकिन लक्ष्मणानंद ने बंदूक उठाकर फायर कर दिया। इसके बाद अंग्रेजों की ओर से भी फायरिंग शुरू हो गई। ब्रह्मचारी को 18 गोलियां लगीं। गेंदालाल दीक्षित को जांघ में छर्रा लगा और आंख को छूते हुए गोली निकल गई।

इस संघर्ष में 50 अंग्रेजी सैनिक मारे गए और 36 क्रांतिकारी शहीद हुए। गेंदालाल को ग्वालियर किले में कैद कर दिया गया। बाकी को भिंड हवालात में बंद किया गया। उधर, मुखबिर दलपत सिंह ने मैनपुरी के जिला मजिस्ट्रेट के आगे मातृवेदी के राज (अगली कड़ी में विस्तार से) खोल दिए। 11 क्रांतिकारियों की गिरफ्तारी हुई। इसमें गेंदालाल दीक्षित का नाम सामने आया तो उन्हें मैनपुरी लाया गया। उन्होंने सारा दोष खुद पर लेकर कई क्रांतिकारियों को रिहा करा दिया। आरी से सींखचे काटकर दीक्षित जी हवालात से भाग निकले। भूमिगत होकर क्रांति के लिए कार्य करते हुए उन्हें क्षयरोग हुआ और 21 दिसंबर 1920 को दिल्ली के एक अस्पताल में लावारिस के रूप में निधन हो गया। बाद में रामप्रसाद बिस्मिल ने प्रभा मैगजीन में विस्तृत लेख लिखकर उनके बलिदानी जीवन का बखान किया।

डकैतों की बहादुरी और अनुभव का क्रांति में उठाया फायदा

पंडित गेंदालाल दीक्षित का जन्म 30 नवंबर 1888 को उत्तर प्रदेश के आगरा के मई गांव में हुआ। घर की आर्थिक परिस्थिति ठीक न होते हुए भी गेंदालाल ने दसवीं तक पढ़ाई की। घर के खर्चों में हाथ बंटाने के लिए उन्होंने उप्र में औरैया जिले के डीएवी स्कूल में शिक्षक की नौकरी स्वीकार कर ली। इसी दौरान 1905 में हुए बंग-भंग के बाद चले स्वदेशी आंदोलन का उन पर अत्यधिक प्रभाव पड़ा। क्रांति के इस दौर में गेंदालाल को एक ऐसी योजना सूझी, जो शायद ही किसी को सूझती! उस वक्त डकैतों का बड़ा प्रभाव था। ये डकैत बहादुर तो बहुत थे, पर केवल अपने स्वार्थ के लिए लोगों को लूटते थे। ऐसे में गेंदालाल ने ऐसा उपाय सोचा, जिससे इन डकैतों की बहादुरी और अनुभव का फायदा स्वतंत्रता की लड़ाई के लिए उठाया जा सकता था। जल्द ही गेंदालाल की शिवाजी समिति के साथ बिस्मिल ने ‘मातृवेदी’ की स्थापना की।

यादें नहीं संजोईं

हद तो यह रही कि आजादी के इस मतवाले की सुध स्वतंत्रता के वर्षों बाद तक नहीं ली गई। शोधार्थी शाह आलम बताते हैं कि इनके गौरवशाली इतिहास का जिक्रकर औरैया नगर पालिका और दोस्तों का सहयोग लेकर 12 अगस्त 2015 को शहर में उनकी प्रतिमा स्थापित कराई। पैतृक गांव मई में उनकी निशानियों को संजोने का कोई सरकारी प्रयास नहीं हुआ।

स्वतंत्रता दिवस के मौके पर हमारी यह कोशिश इन अमर बलिदानियों के प्रति कृतज्ञता जताने के साथ नई पीढ़ी में वही देशभक्ति का भाव जगाने की है, जिसके वशीभूत होकर इन क्रांतिकारियों ने संघर्षों के बीहड़ में जीवन काट दिया। प्रस्तुत है शाह आलम की पुस्तक मातृवेदी से गुमनाम क्रांतिकारियों की एक और कहानी।

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Posted By: Sanjay Pokhriyal

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