लखनऊ, जेएनएन। शहर में ऐसे कई पेड़ हैं जिन्होंने खुशियों की कई बरातें देखीं तो बुरी यादें भी बाहों में समेटीं। जल्द ही ये परिवार के अनुभवों का हिस्सा बन गए। कई गली-मुहल्ले इनके नाम से पहचाने जाने लगे। शहर में कई पेड़ गली-मुहल्लों, चौराहों और पार्को में आज भी अपनी विशेषताओं की नेक छाया दे रहे हैं। दादी-नानी की कहानियां हों या दोस्ती के अनमोल किस्से, काफी कुछ इन पेड़ों के हिस्से आया है। बचपन की धमाचौकड़ी से लेकर जवानी के दर्द, बुढ़ापे के अकेलेपन के गवाह ये पेड़ आज भी अपनी जिम्मेदारियां निभा रहे हैं। आपको भी सुनाते हैं हरियाली के बरसों पुराने किस्से। जुनैद अहमद की रिपोर्ट..

क्रांतिकारियों की दास्तां बयां करता यह दरख्त

टीले वाली मस्जिद के पीछे लगा इमली का पेड़ काफी पुराना है। प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के गवाह इस पेड़ के बारे में टीले वाली मस्जिद के इमाम मौलाना कारी सैयद फजलुल मन्नान रहमानी ने बताया कि यह पेड़ लगभग दो सौ साल पुराना होगा। 1857 में बगावत की चिंगारी के बाद अंग्रेजों ने यहां करीब चालीस क्रांतिकारियों को फांसी दी थी। क्रांतिकारियों की देशभक्ति और मदरसे पढ़ने वाले बच्चों की यादें इस पेड़ में बसी हैं। इस पेड़ पर किताब ‘मसायरुल कराम’ भी लिखी गई। इसके अलावा कई लेखकों ने अपनी किताबों में इस पेड़ का जिक्र किया है।

 

बॉटनिकल गार्डन में हैं तीन पुराने पेड़

राजधानी के बॉटनिकल गार्डन में तीन पुराने पेड़ हैं जो अपने आपमें इतिहास समेटे हुए हैं। सबसे पुराना बरगद का पेड़ है, जिसकी प्रॉप रूफ ही लगभग दो वर्ष पुरानी है। इस पेड़ की शाखाएं इतनी मोटी हो गई हैं कि यहां एक पेड़ नहीं कई पेड़ नजर आते हैं। इसके अलावा पारिजात का भी पेड़ लगभग डेढ़ सौ साल पुराना है। वहीं साखू का पेड़ भी सौ वर्ष से ज्यादा का हो गया है। ये तीनों पेड़ बॉटनिकल गार्डन का इतिहास बताते हैं। वहां के अधिकारियों की मानें तो जब से यह बॉटनिकल गार्डन बना है, उससे पहले के ये पेड़ हैं। छात्र-छात्रएं इन पेड़ों पर रिसर्च भी करते हैं। 

 

यहां मरीज व तीमारदार करते हैं पूजा

बलरामपुर अस्पताल में स्थित बरगद का पेड़ भी बहुत पुराना है। अस्पताल के पूर्व रसोइये जगत नारायण पांडेय ने बताया कि यह पेड़ लगभग तीन सौ साल पुराना होगा। सवा सौ साल से तो हमारे पूर्वज देख रहे हैं। मेरे पिता भी इसी अस्पताल में काम करते थे, उनके समय में भी यह पेड़ काफी विशाल था। उन्होंने बताया कि करीब दस-बारह साल पहले अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड के प्रभारी डॉ. एमएन सिद्दीकी इस पेड़ की छटाई करा रहे थे, जैसे ही मजदूरों ने आरी चलाई, एक अजीब सी आवाज आई और सभी डर कर भाग गए। तब से लेकर आजतक उस पेड़ को कोई काटने और छांटने की सोचता भी नहीं है। इस पेड़ की पूजा की जाती है। यहां के मरीज व तीमारदार आकर इसकी पूजा करते हैं।

पेड़ के अंदर ही बना लिया मंदिर

रानीगंज चौराहे पर स्थित पीपल का पेड़ आस्था का मंदिर है। इंसानों की आस्था का प्रतीक यह पेड़ लगभग डेढ़ सौ साल पुराना है। लोगों ने इस पेड़ के अंदर ही एक छोटा का मंदिर बना लिया। इस मंदिर पर रोज श्रद्धालु आकर पूजा करते हैं। इसकी शाखाएं काफी दूर तक फैली हुई हैं, कुछ शाखाएं तो घरों के अंदर तक चली गई हैं।

 

नेता से लेकर अभिनेता तक का स्वागत

लाटूश रोड पर लगे पीपल की भी दिलचस्प कहानी है। लगभग सौ वर्ष से अपनी छाया से तमाम लोगों को सुकून दे रहा है। क्षेत्र के 70 वर्षीय वसीम खान ने बताया कि यह पेड़ सौ साल से ज्यादा का होगा। अपने बचपन से इसको देख रहा हूं, उस समय भी यह इतना ही बड़ा था। यहां पर हम लोग खेला करते थे। इस पेड़ के नीचे सभाएं होती थीं। यहां पर अटल बिहारी वाजपेयी, शत्रुघ्न सिन्हा, मुलायम सिंह आदि जैसे नेता अभिनेता मंच लगाते थे। यह पेड़ इतना बड़ा था कि शाम को चौपाल लगती थी, सभी बुजुर्ग यहां बैठते थे, लंबी-लंबी चर्चाएं होती थीं। अब यहां पर एक मंदिर बना दिया गया है, जिसमें लोग पूजा करते हैं।

जू में विलायती इमली है सबसे पुरानी

राजधानी के नवाब वाजिद अली शाह प्राणि उद्यान में लगा पारिजात का पेड़, जो विलायती इमली के नाम से जाना जाता है। इस पेड़ की उम्र एक से पांच हजार वर्ष आंकी गई है। 30 से 40 फीट मोटा व लगभग 45 फीट ऊंचा यह पेड़ अपनी खासियत के लिए दूर-दूर तक मशहूर है। जू के कीपर मुबारक ने बताया कि हमारे बाबा बताते थे यह पेड़ उनके जमाने में भी काफी बड़ा था। इस पेड़ की हर चीज बहुत उपयोगी होती है। ऐसा कहा जाता है इस पेड़ की शाखाएं सूखने के बजाए सिकुड़ जाती हैं।

 

Posted By: Anurag Gupta

अब खबरों के साथ पायें जॉब अलर्ट, जोक्स, शायरी, रेडियो और अन्य सर्विस, डाउनलोड करें जागरण एप