आगरा में 15 नवंबर को सपा का दलित महासम्मेलन, पीडीए के जरिए बसपा के गढ़ में सेंध लगाने की तैयारी
समाजवादी पार्टी 15 नवंबर को आगरा में दलित महासम्मेलन आयोजित कर रही है, जिसका उद्देश्य पीडीए फार्मूले के तहत दलित ...और पढ़ें

HighLights
सपा 15 नवंबर को आगरा में दलित महासम्मेलन आयोजित करेगी।
अखिलेश यादव पीडीए फार्मूले से दलित वोटों को साधेंगे।
बसपा के गढ़ में सेंध लगाने की यह बड़ी तैयारी है।
जागरण संवाददाता, लखनऊ। वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में पीडीए फार्मूले के सहारे दलितों के वोटों में सेंध लगाने वाली समाजवादी पार्टी अब इस मतदाता वर्ग में बड़ी हिस्सेदारी पाने की कोशिश में जुट गई है। नीले रंग से लेकर महापुरुषों के सम्मान तक, प्रतीकों की राजनीति के साथ अब आगरा में 15 नवंबर को दलित महासम्मेलन का आयोजन कर समाज को जोड़ने की तैयारी है।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में आगरा दलितों, विशेषकर जाटवों के बड़े प्रभाव वाला क्षेत्र है और यहां से निकलने वाला सियासी संदेश दूर तक जाएगा। इसे और व्यापक बनाने के लिए पश्चिम यूपी के सभी जिलों में आयोजन के लिए समाज में संपर्क किया जा रहा है। सम्मेलन में सपा प्रमुख अखिलेश यादव मौजूद रहेंगे। यह सीधे उस समूह तक पहुंचने का प्रयास है, जो लंबे समय तक बसपा की सबसे मजबूत राजनीतिक जमीन रहा है।
हालांकि सपा के लिए चुनौती सिर्फ बसपा से दलित वोट खींचने की नहीं है, उसे भाजपा की गैर-जाटव दलितों में बनी पैठ को भी कमजोर करना होगा।प्रदेश की चुनावी राजनीति में दलित मतदाताओं का महत्व केवल आरक्षित विधान सभा सीटों तक ही सीमित नहीं है, बड़ी संख्या में सामान्य सीटों पर भी यह वर्ग जीत-हार का अंतर तय करता है। सपा काफी समय से दलितों में पैठ बढ़ाने की रणनीति पर काम रही है।
अब बसपा के खिसकते आधार और आकाश आनंद व अन्य स्वजन को लेकर मायावती के बदलते निर्णयों के बीच सपा ने अपने पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश तेज कर दी है। सपा प्रमुख अखिलेश यादव के नीले गमछे भी चर्चा में रहे हैं। उन्होंने स्वीकार भी किया कि नीला रंग आंबेडकरवादी और बहुजन राजनीति से जुड़ा रहा है और दलित महासम्मेलन से पहले समाजवादी छात्रसभा की नीली यूनिफार्म लागू कर संदेश दिया है।
अब इसे महासम्मेलन के जरिये समर्थन में बदलने की कोशिश होगी। सम्मेलन के लिए पार्टी ने अपने दलित चेहरे राज्यसभा सदस्य रामजीलाल सुमन को जिम्मा दिया है। वह जिलों में जाकर समाज को आयोजन से जोड़ने में लगे हैं। संगठन भी इस काम में जुटा है। कोशिश है कि विधान सभा चुनाव से पहले दलितों की बड़ी भीड़ जुटाकर माहौल बनाया जा सके।
हालांकि पिछले लोकसभा चुनाव की तरह विधान सभा चुनाव में दलितों में बड़ी हिस्सेदारी पाना आसान नहीं। मायावती अब भी इस समाज के बीच सबसे मजबूत राजनीतिक पहचान हैं। दूसरी ओर भाजपा ने दलित समूहों में संगठन और योजनाओं के जरिये पैठ बनाई है। सपा इसलिए जाटव के साथ अन्य दलित समूहों तक पहुंच बनाने की कोशिश में भी है, जिससे भाजपा के समीकरण को चुनौती दे सके।
