'कोविड खत्म हो गया, पर हिरासत में मौत का अभिशाप जारी', गोंडा कस्टोडियल डेथ मामले में हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणी
लखनऊ हाई कोर्ट ने गोंडा में संजय सोनकर की हिरासत में मौत के मामले में आरपीएफ कर्मियों की अग्रिम जमानत ...और पढ़ें

प्रतीकात्मक तस्वीर।
HighLights
हाई कोर्ट ने हिरासत में मौतों को 'अभिशाप' बताया।
गोंडा में संजय सोनकर की हिरासत में मौत का मामला।
दो आरपीएफ कर्मियों की अग्रिम जमानत याचिका खारिज।
जागरण संवाददाता, लखनऊ। इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने पुलिस हिरासत में मौतों की तुलना कोरोना महामारी से करते हुए गंभीर टिप्पणी की है। न्यायमूर्ति मनीष माथुर ने गोंडा में संजय कुमार सोनकर की हिरासत में मौत के मामले में दो आरपीएफ कर्मियों को अग्रिम जमानत देने से इनकार करते हुए कहा कि कोविड-19 महामारी भले ही खत्म हो गई हो, लेकिन हिरासत में मौत का अभिशाप थमता नहीं दिख रहा है।
ऐसे मामलों में पुलिस कर्मियों पर सामान्य तौर पर उनके खिलाफ लगाए गए आरोपों का खंडन करने का दायित्व होना चाहिए। कोर्ट ने यह टिप्पणी आरपीएफ के सब इंस्पेक्टर करण सिंह यादव और कांस्टेबल अमित कुमार यादव की ओर से दाखिल अलग-अलग आपराधिक अपीलों पर की। दोनों ने विशेष न्यायाधीश (एससी-एसटी एक्ट), गोंडा के चार अगस्त 2026 के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उनकी अग्रिम जमानत अर्जी खारिज कर दी गई थी।
अभियोजन के अनुसार, 28 सितंबर 2025 को मोतीगंज रेलवे स्टेशन क्षेत्र में बरुआचक के पास गोंडा से गुवाहाटी जा रही मालगाड़ी से सरसों के तेल के छह टिन चोरी हो गए थे। आरपीएफ इस मामले की जांच कर रही थी। इसी दौरान किनकी गांव निवासी 35 वर्षीय संजय कुमार सोनकर का नाम सामने आया। एफआईआर के मुताबिक, चार नवंबर 2025 को आरपीएफ कर्मी संजय को चोरी के मामले में पूछताछ के लिए अपने साथ ले गए।
उसी दिन शाम करीब साढ़े चार बजे उसे आगे की जांच के लिए गांव लाया गया और फिर अपने साथ ले गए। अगले दिन सुबह करीब 10 बजे उसके भाई को संजय का शव मुर्दाघर में होने की सूचना मिली। आरोप है कि हिरासत के दौरान उसके साथ मारपीट की गई, जिससे उसकी मौत हो गई।
अपीलार्थियों की ओर से आरोपों को गलत बताते हुए कहा गया कि उन्हें झूठा फंसाया गया है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में जांघ के ऊपरी हिस्से पर खरोंच और दोनों घुटनों पर घर्षण के निशान मिले हैं, लेकिन ये चोटें मृत्यु का कारण बनने वाली नहीं थीं। सरकारी पक्ष ने आरोपों की गंभीरता बताते हुए अग्रिम जमानत का विरोध किया। कोर्ट ने कहा कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट आरोपों की पुष्टि करती है या नहीं, इसका निर्धारण साक्ष्यों के परीक्षण के बाद किया जाएगा।
