लखनऊ (दुर्गा शर्मा)। पर्दे पर स्त्री संघर्ष भी था तो विदेश में रह रहे देशी कामगारों की समस्याएं भी। पति-पत्‍‌नी के नाजुक रिश्ते को भी पिरोया गया। वहीं महिला और रहस्य के ताने बाने को भी बुना गया। गुस्सा और आगे बढ़ने के लिए पीछे छोड़ चुके जीवन को फिर पाने की कहानी भी बयां हुई। जज्बातों के अनूठे प्रसंगों ने दर्शकों को झकझोरा। जागरण फिल्म फेस्टिवल के पहले दिन छोटी फिल्में जीवन की बड़ी बातें कह गई।

दिखाई गई लघु फिल्में

काउंटरफीट कुनकू

सपनों की मायानगरी मुंबई में घर पाना किसी जंग से कम नहीं है। एक सिंगल वूमन के लिए यह जंग और कठिन हो जाती है। ऐसी ही एक मध्यम वर्गीय महिला स्मिता के संघर्ष की आवाज है-काउंटरफीट कुनकू। 15 वर्षो में यह इकलौती भारतीय लघु फिल्म है, जो सनडांस फिल्म फेस्टिवल, यूएसए में दाखिल हो सकी। लेखक/निर्देशक रीमा सेनगुप्ता हैं।

द केयरगिवर

क‌र्त्तव्य, पारिवारिक बंधन और बलिदान की कहानी है। देश और घर से दूर रह रहे कामगारों की स्थिति बयां की गई है। भारत में अपने परिवार से मिलने के बाद राज वापस इजराइल चला जाता है। जिस बुजुर्ग आदमी की वह देखरेख करता है। वहां एक फिलीपींस की महिला उसकी जगह ले लेती है। निर्देशक रुथी प्रीबर हैं।

हमिंग बर्ड

निर्णय ही जीवन की दिशा तय करते हैं। सही-गलत का फैसला आसान काम नहीं है। हमिंग बर्ड एक पति-पत्‍‌नी की कहानी है। किस तरह एक निर्णय दोनों की जिंदगी में उथल पुथल ला देता है। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में शूट की गई है। निर्देशक डॉर्थी क्रिस्टीन हैना हैं।

रोजना

आम कहावत है कि महिलाओं को कोई नहीं समझ सकता। ऐसी ही एक महिला की कहानी को बयां किया गया है जो खुद में गहरा राज समेटे है। वह अपने ही बनाए जाल में फंस जाती है। निर्देशक राज रिषी हैं।

लक्ष्य

लक्ष्य अपनी पुरानी जिंदगी जीने की छटपटाहट की कहानी है। एक लड़का जो इटली में रहता है। वापस अपने घर दिल्ली लौटकर आता है। जिस जिंदगी को वह छोड़ कर गया था उसे दोबारा पाने की जद्दोजहद है।

एवरीथिंग इज फाइन

गुस्सा घातक होता है। झगड़े के बाद लेखक तेज रफ्तार में गाड़ी चलाता है। इसमें एक बच्चे की दुर्घटना हो जाती है। अब वह अपने ही मानसिक उथल पुथल में है कि वह घटना को कैसे नजरअंदाज करे।

मेयर संयुक्ता भाटिया ने कहा कि जागरण फिल्म फेस्टिवल बहुत ही अच्छा लगा। इसमें जो फिल्में दिखाई जा रही हैं वो भी बेहतरीन हैं। आजकल तो हो-हल्ला वाली फिल्में ज्यादा देखने को मिलती हैं। 'कुछ भीगे अल्फाज' फिल्म बहुत अच्छी लगी। अब तो ऐसी फिल्में कम देखने को मिलती हैं।

By Jagran