लखनऊ(जागरण संवाददाता)। किसी विचार के लिए केंद्रित रहना समर्पण है लेकिन सिर्फ उसी विचार के लिए प्रयासरत रहना सनक है। हर समय अपने शरीर को देखना और दिमाग के हर विचार पर ध्यान देना, एक तरह की सनक है। बार-बार एक ही काम को दोहराना, हर समय संशय में रहना, हर वक्त चीजें चैक करना एक गंभीर मानसिक रोग के लक्षण हैं। इसे ऑब्सेसिव कम्पल्सिव डिस्आर्डर (ओसीडी) कहते हैं। देश में पहली बार केजीएमयू के मानसिक रोग विभाग समेत 16 सायक्रेट्री सेंटरों में इस डिस्ऑर्डर पर रिसर्च की गई। इस विचित्र मेंटल डिस्आर्डर पर राफिया नाज की रिपोर्ट। अजीबोगरीब केस:

सिर पर गढ्डे की सनक:

एक अच्छे परिवार का 24 वर्षीय लंबी कद-काठी के युवक को सनक चढ़ी कि उसके सिर के पास गढ्ढा है, वो बार-बार अपने सिर को शीशे में देखता। कई बार प्लास्टिक सर्जन के पास इसके इलाज के लिए गया। मना करने के बाद भी उसने जबरदस्ती सर्जरी करवा ली, फिर भी उसे संतुष्टि नहीं हुई उसने दोबारा सर्जरी करवा ली। मरीज का इलाज अभी मानसिक रोग विभाग में चल रहा है। पापा बन जाएंगे छिपकली: एक 19 वर्षीय लड़की के दिमाग में पिछले एक साल से सनक आ गई कि अगर वो अपने पापा को दिन में चार से पाच बार हाल-चाल नहीं लेगी तो वो छिपकली बन जाएंगे। वो कॉलेज में घर में हर वक्त अपने पापा को फोन लगा-लगाकर उनका हाल लेने लगी जिससे उनके पिता का काम भी बाधित होने लगा। क्या है यह डिस्ऑर्डर?

इस रिसर्च में केजीएमयू ने लीड किया, शामिल केजीएमयू के मानसिक रोग विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ.आदर्श त्रिपाठी ने बताया कि ब्रेन में ऑब्सटीट्यू थेलेमस कोरोनल लूप होता है। यह ब्रेन के बेसिक वर्क और जानकारी को अहसास दिलाता है कि किन बातों पर ध्यान देना है और किस पर नहीं। यह एनालाइज करवाता है कि कौन-सी चीज काम की है और कौन-सी नहीं। इस लूप के डिस्फंक्शन होने की वजह से ऑब्सेसिव कम्पल्सिव डिस्ऑर्डर हो जाता है। इस बीमारी की खासियत यह होती है कि व्यक्ति को पता होता है कि उसे किसी चीज की सनक हो गई है, लेकिन यह जानने के बाद भी वो उससे उभर नहीं पाता है। ऐसी ऐसी सनक:

हर वक्त सफाई करने की सनक :

यह इस बीमारी की सबसे बड़ी पहचान होती है। इसमें महिला या पुरुष दोनों ही दिन में चार पाच बार नहाते हैं। बार-बार हाथ धोते हैं, कहीं से आते हैं फिर से हाथ धोते हैं। इसके बाद भी उन्हें लगता है कि हाथ गंदा है यह सनक इतनी ज्यादा हो जाती है कि वो हाथ धो-धोकर स्किन तक सड़ा देते हैं। बार-बार चीजें चेक करना :

इसमें व्यक्ति हर समय संशय में रहता है, काम करने के बाद भी वो दोबारा चीजें चैक करता है। जैसे घर में कहीं गैस तो खुला नहीं रह गया, गाड़ी में चाभी लगी तो नहीं रह गई, बार-बार लॉक चैक करना।

बुरे विचार आना :

इसमें हर समय व्यक्ति के दिमाग में उल्टे सीधे विचार आने लगते हैं। कई बार यह विचार काफी एग्रेसिव होते हैं, यहा तक कि कई बार मा को यह विचार आने लगता है कि कहीं वो अपने बच्चे को मार न दे। कहीं गला न दबा दे, इस वजह से वो अपने बच्चे से दूरी बना लेती है। खुद को कमरे में बंद कर लेते हैं:

यह विचार अक्सर पुरुषों में आते हैं जिसमें उन्हें लगता है कि कहीं वो किसी लड़की को देखेंगे तो उसके प्रति मन में गलत विचार आ जाएंगे। इसमें वो लड़कियों के सामने आने से भी बचने लगते हैं, यहा तक कि खुद को घर के अंदर बंद तक कर लेते हैं। बार-बार मांगते हैं माफी:

इसमें बात करते-करते उन्हें यह अहसास होने लगता है कि कहीं किसी को बुरा तो नहीं बोल दिया। वो इस चीज को कंफर्म करने के लिए बार-बार उस व्यक्ति से पूछते हैं कि कहीं मैंने आपको कुछ गलत तो नहीं बोल दिया। बार-बार वो इस बात की माफी मागने लगते हैं। पुराना सामान इकट्ठा करने की आदत:

इसमें घर की बेकार की पुरानी चीजों को इकठ्ठा करके रखने लगते हैं। इस हद तक इकठ्ठा करते हैं कि उनके घर में पैर रखने की जगह भी नहीं बचती है। हर वक्त चीजें ठीक करते हैं :

यह सिम्पटम अक्सर पुरुषों में ज्यादा होता है। वो अपनी चीज को जैसी होती है उसे वैसी ही रखते हैं। इस सनक इतनी ज्यादा होती है कि वो हर वक्त उस चीज को छू-छूकर सही करते रहते हैं। मीटिंग छोड़कर पहुंच गया बहन के घर:

एक 30 वर्षीय पुरुष को हर समय यह लगता था कि वो कुछ गलत तो नहीं कर रहा है। वो हर वक्त फोन मिलाकर लोगों से पूछता रहता था कि उसने उन्हें कुछ गलत तो नहीं कह दिया है। इसी सनक में एक बार उसने अपनी बहन को फोन करके पूछा उसका फोन ऑफ हो गया तो वो मीटिंग छोड़कर बहन के घर सीधे मेरठ पहुंच गया। सिर्फ यह पूछने के लिए कि उसने कुछ उसे गलत तो नहीं कह दिया।

महत्वपूर्ण तथ्य:

पुरुषों में कम उम्र में शुरू हो जाती है ओसीडी :

डॉ.त्रिपाठी ने बताया कि इस बीमारी पर अब तक कि भारत में कोई स्टडी नहीं की गई थी। केजीएमयू के 120 मरीजों पर यह अध्ययन किया गया। 100 में से दो प्रतिशत लोगों को होती है। यह बीमारी पुरुषों में महिलाओं की अपेक्षा कम उम्र में शुरू हो जाती है। डिसएबिलटी डिजीज:

इस बीमारी की वजह से साधारण सा दिखने वाला व्यक्ति कोई भी काम नहीं कर पाता है। वो पूरे दिन एक ही विचार में गुम रहता है। बॉडी डिस्मोर्फिक डिस्ऑर्डर भी शामिल:

ओसीडी के साथ कई बार मरीजों को एंजाइटी, डिप्रेशन और बॉडी डिस्मोर्फिक डिस्ऑर्डर भी हो जाता है। इस डिस्ऑर्डर में व्यक्ति को हर वक्त लगता है कि उसके शरीर में कोई न कोई कमी है। वो बार-बार अपने चेहरा और मुंह को देखने लगता है।

हानिरहित होते हैं ऐसे लोग:

अन्य मेंटल डिस्ऑर्डर की भाति इस रोग से पीड़ित लोग कभी किसी को नुकसान नहीं पहुंचाते हैं। सिर्फ किसी को नुकसान न पहुंचा दे इस विचार से घिरे रहते हैं।

कॉम्प्लेक्स होता है इलाज:

एक्सपोजर एंड रिस्पांस तकनीक का सहारा:

इस बीमारी का इलाज काफी कॉम्प्लेक्स होता है। इसमें एक्सपोजर एंड रिस्पास प्रीवेंशन तकनीक को अपनाया जाता है। इसमें मरीज से एक लिस्ट बनवाई जाती है, जिसमें उसे किस चीज से ज्यादा एलर्जी है या कौनसी चीज उसे ज्यादा परेशान कर रही है, पूछा जाता है। इसके बाद काउंसलर और डॉक्टर के बताए अनुसार मरीज की एंजाइटी लेवल को कंट्रोल किया जाता है। जैसे कि अगर किसी को गंदगी से एलर्जी है तो उसके आगे गंदे जूते रख दिये जाते हैं और मरीज को कहा जाता है कि वो उसे बर्दाश्त करे, जब तक वो कर सकता है। एक बार मरीज अपने इस बर्दाश्त के लेवल को पार कर जाए तो फिर दूसरी चीजों से शुरुआत की जाती है। इस बीमारी में अलग-अलग लक्षणों के हिसाब से मॉडल डेवलप किये जाते हैं, लेकिन इसका इलाज काफी जटिल होता है। इसमें मरीज और परिवारीजनों को पूरी इच्छा शक्ति लगानी होती है। सेल्फ हेल्प बुक्स की ली जाती है मदद:

मॉडल्स के अलावा मरीजों को सेल्फ हेल्प बुक्स दी जाती है।

यू ऑर नॉट योर बॉडी ऑर माइंड:

डॉ.त्रिपाठी ने कहा कि यह बात समझने की जरूरत है कि यू ऑर नोट योर बॉडी ऑर योर माइंड। आप शरीर हैं, लेकिन शरीर आप नहीं है। मन और तन से हटकर आप क्या हैं इसे समझने की जरूरत है। मस्तिष्क एक कारगर यंत्र है, वो बहुत पॉवरफुल है, लेकिन अपने दिमाग के किन विचारों पर हमें ध्यान देना है इसे हमें भी समझना होगा। किस विचार पर ध्यान देने की जरूरत है और किस पर नहीं इसे हमें सीखना पड़ेगा।

Posted By: Jagran

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