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लखनऊ, (आशुतोष मिश्र)। जिस अंग्रेजी हुकूमत का सूरज कभी नहीं डूबता था, उसके आगे गिनती भर आजादी के दीवाने चुनौती बन उठे थे। जज्‍बे और वीरता के साथ खास युद्ध कला का प्रशिक्षण ही था, जिसने मातृवेदी का खौफ अंग्रेजों में भर दिया था। क्रांतिकारियों के इस संगठन के दो नायक रामप्रसाद बिस्मिल और मुकुंदी लाल ने संगठन से मिले प्रशिक्षण का बखूबी इस्तेमाल करते हुए अंग्रेजी हुकूमत की नींद उड़ा दी थी। तारीख में अमर नौ अगस्त के काकोरी कांड को इसी खास युद्ध कला के बल पर अंजाम दिया गया था।

ये दोनों ही क्रांतिकारी मातृवेदी के कमांडर इन चीफ गेंदालाल दीक्षित के काफी निकट थे। मैनपुरी केस में गिरफ्तार होने के बाद जज ने मुकुंदी लाल का पेशा हॉकर (पत्र वितरक) के रूप में दर्ज किया था। वह अपने गुरु गेंदालाल दीक्षित की उस गुप्त योजना के राजदार थे, जिसके तहत संयुक्त प्रांत के 12 कलेक्टर और एसपी को मौत के घाट उतार जाना था। मुखबिरी के चलते योजना सफल न हो सकी और मुकुंदी गिरफ्तार कर लिए गए। असंख्य यातनाओं से भरी सजा काटकर निकलने के बाद भी मातृवेदी के इस सैनिक ने क्रांति की राह नहीं छोड़ी।

मातृवेदी के तहस-नहस होने के बाद शचीन्द्रनाथ बख्शी के संपर्क में आकर मुकुंदी लाल हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन से जुड़ गए। इधर, पहले ही इस संगठन के साथ जुड़ चुके पंडित राम प्रसाद बिस्मिल काकोरी कांड की पटकथा रच चुके थे। नौ अगस्त 1925 को काकोरी ट्रेन से अंग्रेजों का खजाना लूटकर क्रांतिकारियों ने हुकूमत को बेचैन कर दिया। इसी केस में पकड़े जाने के बाद पंडित राम प्रसाद बिस्मिल ने गोरखपुर जेल में फांसी का फंदा चूम कर अपना सर्वोच्च बलिदान दिया था तो वहीं मुकुंदी लाल को काला पानी की सजा हुई थी।

काकोरी कांड में अशफाक उल्लाह खान, ठाकुर रोशन सिंह और राजेंद्र नाथ लाहिड़ी को भी फांसी हुई। इसके बाद एचआरए के 16 प्रमुख क्रांतिकारियों को चार वर्ष से लेकर उम्रकैद की सजा से यह संगठन छिन्न-भिन्न हो गया। बाद में चंद्रशेखर आजाद और भगत सिंह ने इसे हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन बनाकर पुनर्जीवित किया। फांसी के फंदे पर झूलने वाले काकोरी के वीर इस संगठन के क्रांतिकारियों के लिए प्रेरणा का स्नोत बने। क्रांतिकारियों का यह बलिदान आजादी की लड़ाई में अमर हो गया।

मैनपुरी षड्यंत्र में भगोड़ा घोषित किए गए थे बिस्मिल मैनपुरी षड्यंत्र केस में फंसने के बाद मातृवेदी के कमांडर इन चीफ गेंदालाल दीक्षित हवालात के सींखचे काट कर फरार हो गए थे, वहीं इस मामले में अंग्रेज पंडित राम प्रसाद बिस्मिल को गिरफ्तार नहीं कर सके थे। मातृवेदी पर पुस्तक लिखने वाले शाह आलम बताते हैं कि अंग्रेज सरकार ने इन दोनों क्रांतिकारियों को मैनपुरी षड्यंत्र का भगोड़ा घोषित किया था। इस बीच बिस्मिल जी ने क्रांति के लिए प्रेरित करने वाले कई पर्चे छपवाए और बटवाए।

 

बिस्मिल ने देश के लिए लुटा डाली घर की संपत्ति

राम प्रसाद बिस्मिल ने देश के लिए अपनी पारिवारिक संपत्ति लुटा डाली। व्यापार के नाम पर मां से रकम लेकर क्रांतिकारी साहित्य छपवाने वाले बिस्मिल फांसी से पहले लिखे पत्र में इसका खुद ही जिक्र करते हैं। क्रांतिकारियों से जुड़े साहित्य एवं निशानियों के संग्रह का शौक रखने वाले गोरखपुर के समाजसेवी सुभाष चंद्र अकेला की लाइब्रेरी में इसकी बाबत जानकारी है। अंतिम दिनों में अशफाकउल्लाह खान को लिखी चिट्ठी में उन्होंने लिखा है कि प्यारे भाई! तुम्हें यह समझकर संतोष होगा कि जिसने अपने माता-पिता की धन संपत्ति को देश सेवा में अर्पित करके उन्हें भिखारी बना दिया, जिसने अपने सहोदर के भावी भाग्य को देश सेवा में भेंट कर दिया, जिसने अपना तन, मन, धन सर्व स्वत: मातृ सेवा में अर्पण करके अपना अंतिम बलिदान भी दे दिया, उसने अपने प्रिय सखा अशफाक को भी इसी मातृभूमि को भेंट चढ़ा दिया।

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Posted By: Sanjay Pokhriyal

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