अयोध्‍या, [रविप्रकाश श्रीवास्तव]। राम सबके हैं...। यह कथन सलाखों के पीछे भी चरितार्थ होता नजर आता है। कभी दूसरों की संपत्ति और सुख छीनने वाले हाथ अब राम नाम की पूंजी बटोर रहे हैं। अयोध्या की जेल में राम नाम की लूट में 250 हिंदू-मुस्लिम बंदी रमे हुए हैं। अयोध्या कारागार में अपने अपराधों की सजा भोग रहे कई बंदी राम नाम की साधना से अपने गुनाहों का प्रायश्चित कर रहे हैं। राम सर्वधर्ममय हैं...। इस सत्य को साबित करने में शाहिद, समीर और सूफियान सरीखे बंदी उदाहरण के रूप में मौजूद हैं, जो हि‍ंदू बंदियों के साथ मिल कर राम नाम के धन से अपना भंडार भर रहे हैं। रामनाम की वर्षा से अपने पाप धुल कर ईश्वर से कष्ट काटने की अनुनय कर रहे हैं।

एक-दो दिन नहीं बल्कि कई महीनों से ये बंदी राम नाम के सहारे अपनी बिगड़ी बनाने का जतन कर रहे हैं। इनकी साधना के प्रमाण जेल में रखे उन तमाम पत्रकों से मिलते हैं, जिन पर इन्होंने सुर्ख स्याही से राम नाम लिखकर राम के प्रति अपनी आस्था और उनके लोकनायक होने की छाप छोड़ी है। जेल में 245 पुरुष व पांच महिला बंदी प्रतिदिन राम नाम लिखते हैं। कोरोना काल में मुलाकात बंद हुई तो इन बंदियों ने खाली बचे समय में इस साधना को और भी विस्तार दे दिया। जेल प्रशासन के पास चार गत्ता पत्रक एकत्र हो चुके हैं।

शहर के प्रतिष्ठित सराफा व्यापारी और आनलाइन रामनाम बैंक संचालित करने वाले पवन अग्रवाल राम नाम लेखन के इस अभियान को पूरी श्रद्धा से आगे बढ़ा रहे हैं। अब तक उनके पास रामनाम की पूंजी करोड़ों में हो चुकी है। जेल में बंदियों को राम नाम लिखने के लिए पत्रक भी पवन ही उपलब्ध कराते हैं। कोरोना संक्रमण की रफ्तार धीमी होने के बाद उन्होंने जेल अधीक्षक शशिकांत मिश्र से मिल कर बंदियों के लिए पत्रक सौंपा। राम नाम लिखने के अनुरागी बंदियों में युवा एवं प्रौढ़ दोनों वर्गों के बंदी शामिल हैं। जेल अधीक्षक कहते हैं कि बंदियों में राम नाम लिखने की लगन सराहनीय है। मुस्लिम बंदी, जितनी शिद्दत से नमाज अदा करते हैं उसी श्रद्धा से राम नाम भी लिखते हैं और स्वास्तिक का चिह्न भी बनाते हैं। इनसे बात करने पर मालूम हुआ कि राम सबके हैं।

Edited By: Anurag Gupta