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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Aug 06, 2017 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

प्रदेश में केवल SGPGI में आर्गन ट्रांसप्लांट, एक वर्ष की वेटिंग

By Dharmendra PandeyEdited By:
Published: Sun, 06 Aug 2017 10:35 AM (IST)Updated: Sun, 06 Aug 2017 12:03 PM (IST)

इंडियन सोसाइटी ऑफ नेफ्रोलॉजी के सचिव प्रो.नारायन प्रसाद कहते हैं प्रदेश में केवल एक संस्थान है जो किडनी ट्रांसप्लांट कर रहा है। तमिलनाडु में 60 सेंटर है।

प्रदेश में केवल SGPGI में आर्गन ट्रांसप्लांट, एक वर्ष की वेटिंग
प्रदेश में केवल SGPGI में आर्गन ट्रांसप्लांट, एक वर्ष की वेटिंग

लखनऊ [कुमार संजय]। 35 वर्षीय राम प्रसाद की किडनी काम नहीं कर रही है। इलाज किडनी ट्रांसप्लांट है। पत्नी किडनी देने के लिए सारी जांच करा चुकी है। ट्रांसप्लांट कराने को संजय गांधी पीजीआइ में एक वर्ष बाद की तारीख मिल रही है। 

एक साल तक इन्हें डायलिसिस पर ही रहना पड़ेगा। इससे पहले भी यह कई बार इंंफेक्शन के कारण भर्ती हो चुके हैं और इनका दो लाख रुपये खर्च हो चुका है। अब इनके पास ट्रांसप्लांट कराने का पैसा नहीं बचा है।

केवल राम प्रसाद ही नहीं इस तरह के लगभग 80 हजार लोग प्रदेश में हैं जिन्हें किडनी ट्रांसप्लांट की जरूरत है। विशेषज्ञ कहते हैं कि डायलिसिस के दौरान हेपेटाइिटस बी और सी का इंफेक्शन होने की आशंका 60 से 70 फीसद मामलों में होती है, जिससे निपटने में ही मरीज का काफी पैसा खर्च हो जाता है।

यह तब है जब डोनर मरीज के पास होता है। ऐसे में कैडेवर की कल्पना करना संभव नहीं है। हाल यह है कि बीएचयू और केजीएमयू में ट्रांसप्लांट शुरू हुआ और बंद हो गया। केवल लोहिया संस्थान लखनऊ ने शुरू किया जो चलाना चाहता है, लेकिन अभी रफ्तार नहीं पकड़ पा रहा है।

इंडियन सोसाइटी ऑफ नेफ्रोलॉजी के सचिव प्रो.नारायन प्रसाद कहते हैं कि प्रदेश में केवल एक संस्थान है जो किडनी ट्रांसप्लांट कर रहा है। तमिलनाडु में लगभग 60 सेंटर है जहां किडनी ट्रांसप्लांट होता है। अब केवल एक संस्थान के भरोसे किडनी ट्रांसप्लांट की वेटिंग खत्म करना संभव नहीं है। कारपोरेट अस्पतालों में ट्रांसप्लांट महंगा है। सभी लोग इतना खर्च नहीं उठा सकते हैं। प्रदेश में कम से कम 60 ट्रांसप्लांट सेंटर शुरू हों तब मरीजों को राहत मिलेगी।

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पीजीआइ भी नहीं बढ़ा रहा मरीजों की संख्या 

पीजीआइ भी किडनी ट्रांसप्लांट के मरीजों की संख्या नहीं बढ़ा पा रहा। गत दस वर्षों से प्रत्येक वर्ष 120 से 130 ही किडनी ट्रांसप्लांट हो पा रहा है जबकि इसकी संख्या 200 से अधिक होनी चाहिए। विशेषज्ञ कहते है कि इसके पीछे संसाधन की कमी है, जिसमें ओटी की संख्या, एनेस्थेसिया, ट्रांसप्लांट सर्जन की कमी, किडनी ट्रांसप्लांट यूनिट का विस्तार शामिल है। 

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पाजीआइ में क्यों सफल है किडनी ट्रांसप्लांट

पीजीआइ में किडनी ट्रांसप्लांट की सफलता के पीछे किडनी रोग विशेषज्ञ और किडनी ट्रांसप्लांट सर्जन के बीच अच्छा तालमेल है। नेफ्रोलॉजिस्ट की टीम ट्रांसप्लांट के तुरंत बाद से केयर करती है और किसी तरह की परेशानी होने पर सर्जन से सलाह लेती है।