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अपराध का नया तरीका : बंदूक न बारूद, बस एक मोबाइल कॉल पर ही करोड़ों साफ

Published: Fri, 30 Oct 2026 06:55 PM (IST)

New Modus Operandi Of Crime: ठगों का सबसे कारगर हथियार लोगों का डर रहा। पैसे अलग-अलग खातों और प्रदेशों में गए। इससे पुलिस अंतिम कड़ी तक नहीं पहुंच पाई।

साइबर अपराध डिजिटल डकैती

साइबर अपराध डिजिटल डकैती 

HighLights

  1. सुप्रीम कोर्ट ने साइबर अपराध को बताया डिजिटल डकैती

  2. लखनऊ में चार मामलों में 3.55 करोड़ रुपये से अधिक की ठगी, मास्टरमाइंड तक नहीं पहुंच पा रही पुलिस


अवनीश मिश्र, लखनऊ : न हथियार, न बारूद, न घर में घुसने की जरूरत और न मारपीट। सिर्फ एक मोबाइल कॉल और जांच एजेंसियों के अधिकारियों के नाम का इस्तेमाल। गिरफ्तारी, जेल और परिवार को फंसाने की धमकी।

इसके बाद पीड़ित खुद जीवनभर की कमाई साइबर ठगों के हवाले कर देता है। सुप्रीम कोर्ट ने साइबर अपराध को डिजिटल डकैती कहा है। लखनऊ में सामने आईं ऐसी ही चार बड़ी वारदातों के जरिये दैनिक जागरण ने इस अपराध का पूरा तंत्र समझने की कोशिश की।

ठगी की रकम और घटनाक्रम भले अलग-अलग हों, लेकिन चारों मामलों में ठगों का सबसे कारगर हथियार लोगों का डर रहा। पैसे अलग-अलग खातों और प्रदेशों में गए। इससे पुलिस अंतिम कड़ी तक नहीं पहुंच पाई।

गिरफ्तारी वारंट की धमकी

सेना के रिटायर्ड कैप्टन मोहन लाल आहूजा को 16 अगस्त को खुद को दिल्ली मुख्यालय का पुलिस इंस्पेक्टर बताकर फोन किया गया। आधार कार्ड से फर्जी सिम और डेबिट कार्ड जारी होने और गैरकानूनी गतिविधियों में इस्तेमाल की बात कही गई। एटीएस और ईडी की जांच व गिरफ्तारी का डर दिखाकर 20 अगस्त को 51 लाख रुपये ट्रांसफर करा लिए। पुलिस ने 22 लाख रुपये रिकवर कराए।

आतंकी गतिविधियों में सिम के इस्तेमाल का भय

70 वर्षीय माधुरी भगत को बताया गया कि उनके पति के नाम से जारी सिम का इस्तेमाल आतंकी गतिविधियों में हुआ है। मुंबई में मुकदमे और पुणे एटीएस में पेशी का डर दिखाया। आइपीएस अधिकारी बनकर सुरक्षा प्रमाणपत्र का भरोसा दिया। 20 से 22 जुलाई के बीच खातों में 70 लाख रुपये भेजवाए। पुलिस ने 18.50 लाख रुपये रिकवर कराए।

दिखाया मानव तस्करी और मनी लांड्रिंग कर डर

मानव तस्करी और मनी लांड्रिंग कर डर 75 वर्षीय रत्ना कौल को एटीएस अधिकारी बनकर फोन किया गया। फर्जी गिरफ्तारी वारंट दिखाकर करीब छह दिन वीडियो काल की निगरानी में रखा। एफडी तुड़वाकर 78.50 लाख रुपये ठग लिए। पुलिस ने 22 लाख रुपये रिकवर कराए।

सुरक्षा प्रमाणपत्र का झांसा

75 वर्षीय डा. जिया सुल्ताना को आधार कार्ड के गैरकानूनी गतिविधियों में इस्तेमाल होने का डर दिखाया गया। एनआइए अधिकारी बनकर सुरक्षा प्रमाणपत्र के बाद रकम लौटाने का भरोसा दिया। 13 से 17 अप्रैल के बीच चार ट्रांजेक्शन में 1.55 करोड़ रुपये ठग लिए। पुलिस ने 42 लाख रुपये रिकवर कराए।

मास्टरमाइंड तक नहीं पहुंचती है पुलिस

साइबर एक्सपर्ट कामाक्षाी शर्मा ने बताया कि साइबर अपराध में पुलिस की जांच कई स्तर पर अटकती है। ठगी की रकम म्यूल खातों के जरिये अलग-अलग राज्यों और विदेश में भेजी जाती है। खाताधारक, खाता संचालित करने वाला और असली ठग अलग-अलग होते हैं। पुलिस कई बार खाताधारक तक पहुंचती है, लेकिन मास्टरमाइंड तक नहीं पहुंच पाती है। दूसरी चुनौती पैसे की है। शिकायत मिलने तक पैसा कई खातों से होकर निकाला जा चुका होता है। फर्जी सिम, इंटरनेट काल और दूसरे डिजिटल माध्यमों से वास्तविक आरोपित की पहचान करना भी आसान नहीं होता।

साइबर ठगी से बचने का सबसे बड़ा हथियार सावधानी

अपर पुलिस उपायुक्त क्राइम लखनऊ किरन यादव ने बताया कि साइबर ठगी से बचने का सबसे बड़ा हथियार सावधानी है। लोग जागरूक होकर इससे बच सकते हैं। यदि ठगी का शिकार हो जाएं तो जितनी जल्दी हो सके उतनी जल्दी 1930 पर शिकायत करें। बैंक को सूचना दें। राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल पर शिकायत दर्ज करें। पुलिस लगातार जागरूकता अभियान चला रही है।

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