राजेंद्र पंडित। हेल्लों... कुछ पता चला... क्यों क्या हुआ... वो प्रमोद तिवारी जी का एक्सीडेंट... उफ्फ... बदहवास कर देने वाली खबर...। आगे क्या कहा गया कुछ सुनाई नहीं दिया। दिमाग सुन्न पड़ गया। चलचित्र की तरह घूम गया वो बीस साल पहले का कवि सम्मेलन जो बाराबंकी के एक इंटर कॉलेज में आयोजित था। मैं उन दिनों भी छोटा कवि ही था और प्रमोद जी नामी गजलगो और प्रतिष्ठित गीतकार। स्वभाव और हनक सुन रखी थी लिहाजा उचित दूरी बनाकर मंच के एक कोने में अपनी बारी का इंतजार कर रहा था। बारी आयी कविता पढ़ी, लिफाफा लिया घर आ गया। मन में गुनगुनाती रही प्रमोद जी की पंक्तियां 'मैं झूम के गाता हूं कमजर्फ जमाने में, एक आग लगा ली है एक आग बुझाने में।

ठीक आठ दिन बाद एक प्रतिष्ठित समाचार पत्र में मेरे विषय में विशुद्ध हास्य लिखने और पढऩे पर आधे पेज का आलेख छापा था जिसके लेखक थे प्रमोद तिवारी मैं आश्चर्यचकित क्योंकि तब तक मेरी प्रमोद जी से न तो प्रत्यक्ष और न ही परोक्ष बात हुई थी। हां उस कवि सम्मेलन में मैंने खूब पढ़ा जरूर था और श्रोताओं ने सराहना की थी। संयोजक डॉ. नरेश कात्यायन से मैंने पूरी बात बतायी तो उन्होंने प्रमोद जी के संदर्भ में अलमस्त फकीर शब्द का प्रयोग किया। धीरे-धीरे मेरी प्रमोद जी निकटता इस कदर बढ़ी कि एक रात दो बजे उन्होंने फोन किया, 'सो रहे हो क्या? मैंने कहा,'यह एक ऐसा प्रश्न है या तो इसका कोई उत्तर नहीं होगा अथवा इसका उत्तर ही नहीं होगा। किसी सूरत में इसका उत्तर हां नहीं हो सकता।

प्रमोद जी बोले, 'वो छोड़ो अभी अभी एक गीत पूरा किया है सुन लो मैंने कहा, 'बजो उन्होंने सस्वर गाया, 'अगर देश से प्यार करते हो पंडित, अगर मुल्क से है मुहब्बत मियां तो तुम्हे राग अपना बदलना पड़ेगा पूरा गीत सुनते सुनते मैं उठकर बैठ चुका था दोनों तरफ पत्नियां अपने भाग्य और पतियों को कोस रही थी क्योंकि प्रमोद जी थे कि आठ गीत 13 गजल गा चुके थे इसके बावजूद मैं था कि 'राहो में रिश्ते बन जाते है और 'याद बहुत आते है गुड्डे गुडिय़ों वाले दिन आदि गीतों की डिमांड कर रहा था। मैंने उनकी रोटी भी खाई है और डांट भी। उनके संयोजन, उपसंयोजन और निर्देशन में कई कवि सम्मेलन पढ़े। मेरा तो अभिभावक चला गया।

(लेखक ख्यातिलब्ध गीतकार हैं।)  

By Ashish Mishra