लखनऊ एक ऐसा शहर है जहां विरासत में मिलीं धरोहरों के बीच आधुनिक इमारतें नए-पुराने के रूप में कदम-ताल करती देखी जा सकती हैं। शहर की इसी खुसूसियत की वजह से लखनऊ राष्ट्रीय ही नहीं अंतरराष्ट्रीय फलक पर चमक रहा है। धरोहरें महफूज रहें, इसका जिम्मा उठाया है राजधानी की डॉ. ममता मिश्रा ने। उनकी कोशिश है कि लोग खासतौर पर युवा अपनी विरासतों का महत्व समझें। विरासतें चाहे पांडुलिपियों के रूप में हों, पेंटिग्स हों या फिर धरोहरें हों, सभी को संरक्षित कर भावी पीढ़ी को सौंपने के संकल्प के साथ वह लगातार आगे बढ़ रही हैं।

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डॉ. मिश्रा का जन्म 12 जुलाई 1964 में कानपुर में हुआ था। शुरुआती पढ़ाई दिल्ली में हुई फिर वह लखनऊ आ गईं। लखनऊ में आर्ट्स कालेज से ग्रेजुएशन करने के बाद आगरा से एमफिल किया। संरक्षण से उनका खास लगाव था, इसलिए नेशनल रिसर्च कंजरवेशन लैबोरेट्री (एनआरएलसी) में प्रशिक्षण लिया। इंडियन नेशनल ट्रस्ट फॉर आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज (इंटैक) से टेक्सटाइल व लंदन से पेपर कंजरवेशन की ट्रेनिंग ली।


इसके बाद इंटैक से ही उन्होंने अपने काम की शुरुआत की। यह वह दौर था जब लोग अपने हेरिटेज के बारे में ज्यादा जागरूक नहीं थे। कोशिश चलती रही और इंटैक के बैनर तले हुसैनाबाद की पिक्चर गैलरी, टैगोर लाइब्रेरी में लगी पेंटिंग्स, लखनऊ विश्वविद्यालय के कालेज ऑफ आर्ट्स के म्यूजियम, नगर निगम के म्यूजियम में लगे चित्रों का संरक्षण किया। साथ ही विधान भवन व राज भवन में लगी पेंटिंग्स को भी संरक्षित करने का बीड़ा उठाया। हजरतगंज स्थित शाही मस्जिद का रेस्टोरेशन, हेमकुंड साहेब के आदि गुरु ग्रंथ और दशम ग्रंथ, कुरान, बाइबल व चित्रकूट के कर्वी में मौजूद जीर्ण-शीर्ण रामचरितमानस का संरक्षण किया।

वह कहती हैं कि विरासतों को सहेज कर आने वाली पीढ़ी को सौंपना बड़ी जिम्मेदारी है। इन प्रयासों का ही नतीजा है कि आज की पीढ़ी विरासतों को संभालने के लिए पूरी तरह से तैयार है। इसके लिए समय-समय पर उन्हें ट्रेनिंग दी जाती है। राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन के तहत इंटैक में पांडुलिपि संरक्षण केंद्र की स्थापना की गई है, जिसके तहत निशुल्क ट्रेनिंग देकर नई पीढ़ी को इसकी जिम्मेदारी लेने के लिए तैयार किया जा रहा है।

इंटैक की निदेशक डॉ. ममता ने बताया कि लखनऊ कोई नया बसाया गया शहर नहीं। विरासतों को समेटे यह शहर आधुनिक वास्तु का प्रयोग कर बनाई गईं इमारतों के साथ आगे बढ़ रहा है। ऐसे में कोशिश यह होनी चाहिए कि नव निर्माण में पुराने नवाबी शहर का अक्स दिखाई दे। इससे नए पुराने के बीच अच्छा समन्वय स्थापित होगा और वही इसे खास भी बनाएगा। लोग अपनी धरोहरों व उसके आसपास साफ-सफाई रखें। इससे एक बेहतर वातावरण तैयार होगा। रास्ते से गुजरते हुए पर्यटक हों या आम शहरी, बेहतर महसूस करेंगे।

गुरु गोविंद सिंह जी की पगड़ी के संरक्षण में मिली मदद
कंजरवेटर आशुतोष बाजपेई के अनुसार केवल किताबी पढ़ाई के आधार पर कोई काम करना मुश्किल होता है। इसके लिए जरूरी है कि प्रैक्टिकल नॉलेज हो। वर्ष 2002 में जब इंटैक ज्वाइन किया तो डॉ.ममता मिश्रा निदेशक थीं। उन्होंने हिम्मत बढ़ाई और हर काम में मदद की। चुनौतियां भी बहुत थीं और अलग-अलग तरह का काम भी। जैसे गुरु गोविंद सिंह जी की पगड़ी का संरक्षण काफी महत्वपूर्ण काम था, लेकिन उनकी मदद से सफलता मिली। हर तरह का काम करने का मौका मिलने से अनुभव भी बढ़ा।

धरोहरों का मौलिक स्वरूप बरकरार रखना सबसे बड़ी चुनौती
काम के दौरान चुनौतियां आना स्वाभाविक है। इन चुनौतियों को लेते हुए आगे बढऩे में ही असल आनंद है। विरासतों को संरक्षित करने में सबसे अधिक चुनौती इस बात की होती है कि उसका मौलिक स्वरूप बरकरार रहे। इसमें पांडुलिपि, ऑयल पेटिंग्स, टेक्सटाइल, पेपर पेंटिंग्स के अलावा वुड व मैटल के सामान सभी कुछ आते हैं। साथ ही धरोहरों के मूल वास्तु से कोई छेड़छाड़ न हो इसका भी ध्यान रखा जाता है। एक बात और ध्यान रखनी होती है कि धार्मिक ग्रंथों आदि का संरक्षण लोगों की आस्था को ध्यान में रखकर किया जाए। हजरतगंज में शाही मस्जिद हो या हेमकुंड साहेब के ग्रंथ, रामचरितमानस की मूल प्रति हो या बाइबल सभी का संरक्षण अत्यंत महत्वपूर्ण था।
ये हो तो बने बात
धरोहरों के आसपास साफ-सफाई हर एक नागरिक की जिम्मेदारी है। शहर में जो इमारतें बनें, उनमें उसी मैटीरियल का प्रयोग हो जो नवाबी व ब्रिटिश काल में किया गया था। पॉलीथीन को पूरी तरह से प्रतिबंधित किया जाए। परिवहन व्यवस्था दुरुस्त हो और अतिक्रमण हटाया जाए। पाठ्यक्रम में शहर को साफ-सुथरा रखने की सीख दी जाए। धरोहरों के नजदीक जो निर्माण हो वह ऐसा न हो जिससे धरोहरें ही छुप जाएं।

-डॉ. ममता मिश्रा

(इंटैक की निदेशक)

By Krishan Kumar