जागरण संवाददाता, लखनऊ 

वर्दी में जवानों को देख बचपन में ही उन्होंने सेना में जाने का फैसला कर लिया था, पर नियति को कुछ और मंजूर था। इसीलिए कोशिशें भी कामयाबी न दिला सकीं। ऐसे में मन में इस बात की कसक रहती कि देश सेवा नहीं कर पाएंगे। अपने जेहन में ऐसा देश प्रेम रखने वाले सौमित्र त्रिपाठी को शायद तब इस बात भान नहीं था जो वीर सपूत सीमा पर देश की सेवा करते कुर्बानी दे देते हैं, उनके परिवार को सम्मान दिलाना भी एक प्रकार से राष्ट्र सेवा है।

चारबाग में एक जांबाज सैनिक से मिले तो उनसे मन की बात की। सिपाही ने कहा, हर सैनिक चाहता है कि उसे सम्मान मिले। बस, यही बात गांठ बांध कर सौमित्र ने 2005 में सैनिकों के साथ ही शहीदों के परिवारों को न्याय और सम्मान दिलाने की मुहिम शुरू की। तब से आज तक उनका प्रयास जारी है। रामनगर ऐशबाग निवासी 30 वर्षीय सौमित्र के पिता राजकुमार त्रिपाठी केजीएमयू में चीफ फार्मासिस्ट व मां किरन त्रिपाठी गृहणी हैं। सौमित्र का इरादा सेना में जाने का था, लेकिन किस्मत में शहीदों के परिजन की सेवा लिखी थी। एक बार अखबार में 'कारगिल के शहीदों को भूली सरकार' शीर्षक से खबर पढ़ी तो मन में ग्लानि हुई।

2005 में कारगिल विजय दिवस से शहीदों के परिवार को सम्मानित करने का कार्यक्रम शुरू किया। पहले कार्यक्रम में शहीद कैप्टन मनोज पांडेय व शहीद जितेंद्र कुमार के परिजन को सम्मानित कराया। कार्यक्रम में आए अतिथियों ने जब इस नेक पहल की सराहना की तो उनका हौसला बढ़ा। फिर वे हर वर्ष ऐसे कार्यक्रम करने लगे।

सैनिक बोर्ड से मिला 52 शहीदों का ब्योरा 

सौमित्र ने शहीदों के परिजन का सम्मान करने की योजना बनाई, लेकिन उनके पास वीर सपूतों के परिवार की सूची नहीं थी। ऐसे में सैनिक बोर्ड से मदद मिली। तत्कालीन जिला सैनिक कल्याण अधिकारी कैप्टन सीवी सिंह ने उन्हें 52 शहीदों की लिस्ट दी। इसके बाद सौमित्र ने शहीदों के घर जाकर ढेरों जानकारियां जुटाईं और उनकी वीरता की गाथा 'जरा याद करो कुर्बानी' पुस्तक में लिख डाली।

वीर गाथा प्रकाशित कराने में 'जागरण' ने की थी मदद 
सौमित्र ने शहीदों की वीर गाथा तो लिख डाली थी, लेकिन प्रकाशन के लिए उनके सामने आर्थिक संकट था। ऐसे में वर्ष 2008 में वह दैनिक जागरण लखनऊ कार्यालय आए। यहां संपादकीय सहयोगियों की मदद से उनके किताब की ढाई हजार प्रतियां छपीं। सौमित्र ने इस पुस्तक को नि:शुल्‍क बांटा। उनका दावा है कि इस इस पुस्तक में शहीदों के परिवार का ऐसा ब्योरा है, जो सेना के पास भी नहीं है। 14 अगस्त 2008 को शास्त्रीनगर में इस पुस्तक के विमोचन कार्यक्रम में पहुंचे सेना के सब एरिया कमांडर एस. अहमद अली भी सौमित्र के प्रयासों की सराहना किए बिना नहीं रह सके।

अब तक 61 शहीदों के परिवार की कराई मदद
सौमित्र ने शहीदों के परिवार का ब्योरा जुटाने के बाद उनका आर्थिक सर्वे भी किया। आर्थिक रूप से अक्षम 40 परिवारों को वर्ष 2009 में एसकेडी संस्थान के सहयोग से 21-21 हजार रुपये तक की सहायता राशि दिलवाई। वहीं, 18 जनवरी 2015 को दिल्ली के एक चार्टर्ड एकाउंटेंट के सहयोग से 21 और शहीदों के परिवार को आर्थिक मदद दिलवायी। यह क्रम आगे के वर्षों में जारी रहा। शहीद की पत्नी सविता तिवारी, शमा देवी जैसे कई परिवार की पेंशन, फंड आदि दिलाने के लिए भी वह पैरवी कर रहे हैं।

जवानों को बंधवाते हैं राखी, रक्षा का दिलाते संकल्प 
सौमित्र जवानों को सामाजिक कार्यों के अलावा पर्वों पर आयोजित कार्यक्रमों में भी आमंत्रित करते हैं। बताते हैं कि हर रक्षाबंधन पर्व पर कार्यक्रम में बहनें जवानों को रक्षा सूत्र बांधती हैं और वे सुरक्षा का वचन देते हैं। ऐसे कार्यक्रमों में शहीदों के परिजन का सेना के अधिकारियों की ओर से सम्मान भी कराया जाता है।

 

By Krishan Kumar