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अनुशासन व कड़े निर्णयों से ‘आयरन लेडी’ कहलाई मायावती, दो दशक पहले अकेले दम पर बनाई थी सरकार

Published: Sat, 12 Sep 2026 11:54 PM (IST)

अनुशासन व कड़े निर्णयों से 'आयरन लेडी' कहलाईं मायावती के फैसलों से बसपा का जनाधार खिसका है। उनके बदलते निर्णय ...और पढ़ें

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HighLights

  1. मायावती ने अनुशासन व कड़े निर्णयों से बसपा को सत्ता तक पहुंचाया।

  2. बदलते फैसलों और घटती सक्रियता से बसपा का जनाधार खिसका।

  3. आकाश आनंद को पार्टी से दूर कर परिवारवाद पर सवाल उठे।

अजय जायसवाल, लखनऊ। भारतीय राजनीति में दलित महिला होने के बावजूद अनुशासन व कड़े निर्णयों के दम पर बसपा को सत्ता के शिखर तक पहुंचाकर ‘आयरन लेडी’ कहलाने वाली मायावती अब अपने ही फैसलों से तमाम सवालों के घेरे में हैं। उनके निर्णय आज भी चौंकाते जरूर हैं, लेकिन उनसे ‘हाथी’ की सेहत सुधरने के बजाय बिगड़ती ज्यादा दिखती है। बार-बार बदलते निर्णयों से जहां पार्टी डेढ़ दशक से सत्ता से बाहर है, वहीं अब परिवार में भी ‘आल इज वेल’ नहीं दिख रहा है।

बदलते फैसलों और फील्ड में मायावती की घटती सक्रियता से खिसकते जनाधार का नतीजा है कि पार्टी सत्ता के शिखर से ‘शून्य’ तक पहुंच चुकी है। बसपा के संस्थापक कांशीराम ने 15 दिसंबर 2001 को मायावती को अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी बनाया था। कांशीराम के जीवित रहते 18 सितंबर 2003 को उन्होंने बसपा की पूरी तरह से कमान संभाली, लेकिन उस समय तक 47 वर्षीय मायावती दूसरे दलों के सहयोग से तीन बार प्रदेश की मुख्यमंत्री बन चुकी थीं।

वर्ष 2007 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने सोशल इंजीनियरिंग के नए फार्मूले से पार्टी के दरवाजे सर्वसमाज के लिए खोले। खासतौर से ब्राह्मणों व मुस्लिमों को जोड़ने का दांव चला और चुनाव में 206 सीटें हासिल कर पहली बार बसपा की बहुमत की सरकार बनाकर, चौथी बार मुख्यमंत्री बनीं। अध्यक्ष होने के नाते पार्टी में अनुशासन व मुख्यमंत्री के रूप में कड़े निर्णयों और नौकरशाही के प्रति बेहद सख्त छवि के चलते मायावती ‘आयरन लेडी’ तक कहलाने लगी।

वर्ष 2012 में सत्ता गंवाने के बाद बसपा को वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में बड़ा झटका लगा, 21 सांसदों वाली पार्टी उस चुनाव में शून्य पर सिमट गई। फिर वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में मायावती ने बड़ा निर्णय लेकर, उस समाजवादी पार्टी से गठबंधन किया, जिसे स्टेट गेस्ट हाउस कांड की वजह से अपना दुश्मन नंबर एक मानती थीं। गठबंधन कमाल तो न कर सका, लेकिन बसपा शून्य से 10 सीटों पर जरूर पहुंच गई।

फिर भी मायावती ने सपा का वोट बसपा प्रत्याशियों को ट्रांसफर न होने की बात कह गठबंधन तोड़ दिया, जबकि दबी जुबान से पार्टी के वरिष्ठ नेता भी निर्णय को ठीक नहीं मान रहे थे। उनका मानना था कि गठबंधन बना रहता तो वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में बसपा सिर्फ एक विधायक और वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में फिर शून्य पर न सिमटती। इस तरह के नतीजों के पीछे युवा भतीजे आकाश आनंद को प्रचार से दूर रखना और संगठन में नए-नए प्रयोग करते हुए कभी कोआर्डिनेटर तो कभी जोनल व्यवस्था खत्म कर पदाधिकारियों के दायित्व बदलते रहने को बड़ा कारण माना गया।

वैसे तो पिछले वर्ष दिल्ली विधानसभा चुनाव में बेहद खराब नतीजों के बाद से ही आकाश पर मायावती की टेढ़ी नजर थी, लेकिन पिछले दिनों तब भी आकाश को पार्टी से बाहर कर दिया गया, जब उनकी शर्त को पूरा करते हुए उसके ससुर अशोक सिद्धार्थ ने राजनीति से संन्यास तक ले लिया। आकाश के छोटे भाई ईशान को पार्टी में अहम जिम्मेदारी दे दी। मायावती के अपनी बात पर कायम न रहने और राजनीति में वंशवाद की सदैव मुखालफत करने के बावजूद अपना उसूल भूलकर वंशबेल को बढ़ाने पर चौतरफा सवाल उठने लगे।

इस तरह के आरोपों का असर कहीं कुछ माह बाद ही होने वाले विधानसभा चुनाव पर न पड़े, इसलिए माना जा रहा है कि मायावती ने एक बार फिर अपने निर्णय से पलटते हुए परिवारवाद को लेकर सफाई देते हुए अपने दोनों भतीजों से किनारा कर नया दांव चला है। फिर में अकेले ही चुनाव लड़ने व अन्य दलों के नेताओं की तरह फील्ड में सक्रियता न दिखने से 70 वर्षीय मायावती के लिए दो दशक बाद फिर सत्ता हासिल करने की राह फिलहाल आसान नहीं मानी जा रही है।

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