v>लखनऊ (जितेंद्र उपाध्याय)। नजाकत, नफासत के शहर-ए-लखनऊ की गंगा जमुनी तहजीब का नजारा बुधवार को एक बार फिर आम हो रहा था। एकता, भाईचारे और मेहमान नवाजी में अपनी अलग पहचान बनाने वाली राजधानी के मनकामेश्वर मंदिर में जब श्रद्धालु कतारों में दर्शन की बारी का इंतजार कर रहे थे तो कतारों के बीच मेहबूब अंसारी लोगों को निश्शुल्क गंगा जल का वितरण कर रहे थे। लखनऊ में गोमती नदी के तट पर बने मनकामेश्वर मंदिर भक्तों में सबकी इच्छाएं पूरी करने के लिए जाना जाता है।

महाशिवरात्रि पर भक्तों की भारी भीड़ 
मनकामेश्वर मंदिर का माहौल ही कुछ अलग रंग लिए हैं। सभी भेद भाव से मुक्त लोगों के बीच यहां सेवादार की तरह काम करने वाले महबूब अंसारी ने आज महाशिवरात्रि पर भोलेनाथ के अभिषेक के लिए श्रद्धलुओं को गंगा जल बांटा। वह मनकामेश्वर मंदिर में 14 साल से यह काम करते आ रहे हैं। महाशिवरात्रि के मौके पर मंदिर में भक्तों की भारी भीड़ उमड़ी है। फूल, बेलपत्र और गंगा जल से भोले भंडारी का अभिषेक हो रहा है। आज यहां भगवान शिव का गंगाजल के अलावा गोमती जल से भी अभिषेक किया गया।
बुजुर्गों को सुलभ दर्शन भी कराते
बाबा भोले नाथ के अभिषेक के लिए लखनऊ के डालीगंज व्यापार मंडल अध्यक्ष मनीष गुप्ता व अन्य व्यापारियों की ओर से बिठूर से गंगा जल लाया गया था। भोर से लेकर देर शाम तक 80 हजार से अधिक शीशियों में गंगाजल का निश्शुल्क वितरण किया गया। वितरण समिति के सेवादार मेहबूब अंसारी भी हर साल बाबा के दर्शन के लिए आने वाले श्रद्धालुओं को न केवल गंगा जल का वितरण करते हैं बल्कि बुजुर्गों को सुलभ दर्शन भी कराते हैं। 
आरती में भी लेते हिस्सा
मेहबूब अली न केवल गंगा जल का वितरण करते हैं बल्कि मनकामेश्वर उपवन घाट पर होने वाली आदि गंगा गोमती की आरती में भी सेवा करते हैं। उनका कहना है कि महंत देव्यागिरि के सानिध्य में वह आरती में सेवा करते हैं। सभी धर्म एक है बस तरीके अलग-अलग हैं। सभी को अपने धर्म के प्रति निष्ठावान होना चाहिए। मैं अपने धर्म के प्रति निष्ठा रखता हूं तो दूसरे के धर्म का आदर करना भी मेरा कर्तव्य है। हम सब इंसान हैं और इंसानियत के नाते पहले मेरे पिता जी और अब मैं महाशिवरात्रि पर सेवा कर रहा हूं।  
 
देव्यागिरी यहां की महंत 
उल्लेखनीय है कि लखनऊ के डालीगंज में गोमती नदी के बाएं तट पर शिव-पार्वती का ये मंदिर बहुत सिद्ध माना जाता है। मंदिर के महंत केशवगिरी के ब्रह्मलीन होने के बाद देव्यागिरी को यहां का महंत बनाया गया। माता सीता को वनवास छोड़ने के बाद लखनपुर के राजा लक्ष्मण ने यहीं रुककर भगवान शंकर की अराधना की थी जिससे उनके मन को बहुत शांति मिली थी। उसके बाद कालांतर में मनकामेश्वर मंदिर की स्थापना कर दी गई।
शांति की अनुभूति का स्थान
गोमती नदी के किनारे बसा यह मंदिर रामायणकाल का है। इनके नाम मनकामेश्वर से ही इस बात की अहसास हो जाता है कि यहां मन मांगी मुराद पूरी होती है। यहां दर्शन पूजन और अभिषेक करने वाले कहते हैं कि इस मंदिर में प्रवेश करते ही शांति की अनुभूति होती है। लोग यहां आकर मनचाहे विवाह और संतानप्राप्ति की मनोकामना करते हैं और उसे पूरा होने पर बाबा का बेलपत्र, गंगाजल और दूध आदि से श्रृंगार करते हैं। हालांकि बाबा एक लोटे जल से भी प्रसन्न हो जाते हैं।
 

By Nawal Mishra