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लखनऊ में पत्नी के हत्यारे पति को उम्रकैद, कोर्ट में नाबालिग बेटे की गवाही बनी आधार

Published: Thu, 01 Oct 2026 01:14 PM (IST)

लखनऊ में पत्नी की चाकू से हत्या करने वाले पति आनंदेश्वर अग्रहरि को कोर्ट ने उम्रकैद और छह लाख रुपये ...और पढ़ें

प्रतीकात्मक तस्वीर।

प्रतीकात्मक तस्वीर।

HighLights

  1. पत्नी की हत्या के दोषी पति को उम्रकैद की सजा।

  2. नाबालिग बेटे की गवाही ने मामले को सुलझाया।

  3. दोषी पर छह लाख रुपये का अर्थदंड भी लगाया।

विधि संवाददाता, लखनऊ। आपसी विवाद में पत्नी की चाकू से 20 वार कर हत्या करने वाले पति आनंदेश्वर उर्फ आनंद अग्रहरि को विशेष न्यायाधीश (सीबीआई) रोहित सिंह ने उम्रकैद की सजा सुनाई। कोर्ट ने दोषी पर छह लाख रुपये का अर्थदंड भी लगाया है।

अर्थदंड की पूरी राशि दोनों नाबालिग बच्चों को बराबर-बराबर दी जाएगी। जिलाधिकारी लखनऊ उनकी पहचान सुनिश्चित करने के बाद यह धनराशि उन्हें देंगे। दोनों बच्चे अपने ननिहाल में नानी के साथ रहते हैं, जिनमें से एक मूक-बधिर है।

अभियोजन की ओर से सरकारी वकील विकास सिंह ने कोर्ट को बताया कि मृतका जान्हवी अग्रहरि के भाई अमन साहू ने पांच दिसंबर 2023 को ठाकुरगंज थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई थी। उनके अनुसार बहन की शादी वर्ष 2008 में हुई थी।

घटना के दिन दोषी ने गला काटकर उसकी हत्या कर दी। यह भी बताया गया कि दोषी और उसका बड़ा भाई चिंटू पहले भी मृतका को प्रताड़ित करते थे, जिसकी शिकायत ठाकुरगंज थाने में पहले भी की जा चुकी थी। रिपोर्ट दर्ज होने के बाद आरोपी फरार हो गया, जिसे पुलिस ने 18 दिसंबर 2023 को कानपुर रोड स्थित कृष्णा नगर मोहल्ले से गिरफ्तार किया था। सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने 10 तथा बचाव पक्ष ने चार गवाह पेश किए।

बेटे की गवाही निर्णायक

मृतका के छोटे बेटे शौर्य अग्रहरि ने कोर्ट को बताया कि चार दिसंबर को उसका पिता उसे स्कूल से लेकर आया था। रास्ते में सिर दर्द की दवा के नाम पर उसे कुछ पिला दिया, जिससे वह घर पहुंचते ही सो गया और अगले दिन होश आया। उठने पर घर में किसी को न पाकर उसने नानी को फोन किया। अलमारी के पास दीवार पर खून के धब्बे भी थे।

कोर्ट ने कहा कि नाबालिग बेटे को दवा पिलाकर सुला देना और उसे छोड़कर बिना बताए फरार हो जाना, आरोपी के बाद के आचरण को दर्शाता है। कोर्ट ने बड़े बेटे की गवाही को भी अहम माना कि मृतका को आखिरी बार पति के साथ ही जीवित देखा गया था।

फैसले में कोर्ट ने विवेचक की कार्यप्रणाली पर सख्त टिप्पणी की। साक्ष्य में आया कि दोषी के घर पर सीसीटीवी कैमरा लगा था, पर उसकी फुटेज विवेचक ने साक्ष्य के रूप में संकलित नहीं की। विवेचक श्रीकांत राय ने दोषी और मृतका की सीडीआर, टावर लोकेशन, घर का डीवीआर और आसपास के सीसीटीवी फुटेज जुटाने का भी कोई प्रयास नहीं किया।

चाकू की बरामदगी के लिए बनाए गए दोनों स्वतंत्र गवाह भी कोर्ट में अपने बयान से मुकर गए। अभियोजन द्वारा पेश किया गया चाकू नया और चमचमाता हुआ रसोई का चाकू था, जिसकी धार पर कोई क्षति नहीं थी। विधि विज्ञान प्रयोगशाला भी यह साबित नहीं कर सकी कि चाकू पर लगा खून मृतका का है।

इसलिए कोर्ट ने दोषी की निशानदेही पर बरामद चाकू को आलाकत्ल नहीं माना। सजा सुनाते हुए कोर्ट ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुसार विवेचक द्वारा छोड़ी गई कमियां अभियुक्त को बरी करने का आधार नहीं हो सकतीं, क्योंकि पत्रावली पर उपलब्ध साक्ष्य से मामला युक्तियुक्त संदेह से परे साबित होता है।

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