अपना घर होने के बावजूद किराए के मकान में रहने को मजबूर, लखनऊ के फैजुल्लागंज में बाढ़ से परिवार घरों में कैद
बाढ़ के कारण फैजुल्लागंज, लखनऊ में हजारों परिवार घरों में कैद हैं और भोजन-पानी का संकट गहरा गया है।

फैजुल्लागंज के मामा कॉलोनी में जलभराव के बीच जाते लोग। जागरण
HighLights
फैजुल्लागंज में बाढ़ से हजारों परिवार घरों में कैद।
भोजन, दूध और पीने के पानी का गंभीर संकट।
राहत नावें अपर्याप्त, लोग किराए के घरों में मजबूर।
बाढ़ ने ठंडे किए चूल्हे, अपने ही घर में लोग बेबस
फैजुल्लागंज में बढ़ता जा रहा पानी, परिवारों के सामने भोजन का संकट
कुछ नाव के सहारे तो कई लोग निकल रहे जान जोखिम में डालकर
महेन्द्र पाण्डेय, लखनऊ। फैजुल्लागंज में बाढ़ का पानी लगातार बढ़ता जा रहा है। गलियों और रास्ते डूबे हैं। हजारों परिवार अपने ही घरों में कैद होकर रह गए हैं। जिनके लिए घर में रहना संभव नहीं रहा, वे सामान समेटकर किराये के कमरों में शरण लेने को मजबूर हैं।
पानी के बीच राहत की नावें चल रही हैं, लेकिन प्रभावितों की संख्या और जरूरत के मुकाबले इनकी पहुंच नाकाफी साबित हो रही है। सबसे बड़ी चिंता अब खाने-पीने के सामान की है। पानी से घिरे मोहल्लों में दुकानें बंद हैं और घरों में रखा राशन भी खत्म होने लगा है।
बाढ़ के शुरुआती दिनों में घर में मौजूद राशन से लोगों ने किसी तरह काम चला लिया, लेकिन अब हालात मुश्किल होते जा रहे हैं। बच्चों के लिए दूध, पीने का पानी और परिवार के लिए भोजन जुटाना चुनौती बन गया है। कई लोग नाव आने का इंतजार करते रहते हैं तो कुछ लोग जान जोखिम में डालकर पानी के बीच से निकलने की कोशिश करते हैं।
दाउदनगर निवासी मानवेंद्र कुमार ने बताया कि घर में जो थोड़ा-बहुत राशन था, वह अब खत्म हो चुका है। पानी चारों तरफ है। बाहर निकलने की हिम्मत नहीं होती और नाव हर समय मिलती नहीं। घर में बच्चे हैं, उनके खाने का इंतजाम कैसे करें, यही चिंता सताती रहती है। राहत शिविर की बात होती है, लेकिन वहां तक पहुंचना भी हमारे लिए आसान नहीं है।
रुद्र नगर की सरिता देवी की आंखों में भी बाढ़ का दर्द साफ नजर आता है। उन्होंने बताया कि पानी बढ़ने के बाद घर से निकलना मुश्किल हो गया है। तीन दिन से चूल्हा नहीं जला है। जो आटा-चावल था, वह भी खत्म होने को है। दुकानें बंद हैं। पैसे हों भी तो सामान कहां से लाएं? बच्चों को भूखा देखकर बहुत डर लगता है।
सुशीला ने कहा कि राहत की उम्मीद में लोग घंटों नाव का इंतजार कर रहे हैं। नाव आती है तो कई लोग एक साथ पहुंच जाते हैं। सबको स्थान नहीं मिल पाता। पानी के बीच से निकलकर शिविर तक जाना बुजुर्गों और महिलाओं के लिए बहुत मुश्किल है। ऐसा लगता है जैसे हम अपने ही घर में बेबस हो गए हैं।
श्रमिक जगदीश ने कहा कि बाढ़ के पानी ने दैनिक जिंदगी पूरी तरह रोक दी है। काम-धंधा बंद है। घर में रखा राशन खत्म हो गया है। अब तो यह चिंता है कि अगला खाना कहां से आएगा। प्रशासन की नावें चल रही हैं, लेकिन हर गली और हर परिवार तक मदद नहीं पहुंच पा रही है। राहत सामग्री पहुंचाने की कोशिश हो रही है, पर पानी से घिरे इलाकों में जरूरतमंद परिवारों तक नियमित भोजन और जरूरी सामान पहुंचाने की व्यवस्था पर्याप्त नहीं है।
