प्यारे देशवासियों,

मैं आज जो पत्र लिख रही हूं, वह सिर्फ अपने मम्मी-पापा, भाई-बहन, दोस्त-रिश्तेदारों के नाम नहीं है। यह पूरे देशवासियों के लिए है। देश की बेटियों की एक समस्या पर मैं देशवासियों का ध्यान आकृष्ट कराना चाहती हूं। यह पत्र मेरा संबोधन भी है, सरकार-प्रशासन से अपील भी है और देशवासियों से चिंतन की प्रार्थना भी है।

कितनी अजीब बात है कि देश में कई जगह छात्रओं को स्कूल आने से सिर्फ यह बात रोकती है कि उनके लिए शौचालय की व्यवस्था नहीं है। जहां हैं, वे इतने गंदे हैं कि जाने लायक नहीं। ऐसी स्थिति से छात्रओं की शिक्षा बाधित होती है। बाकी बेटियों को पढ़ाने का लक्ष्य अधूरा रह जाता है। हालांकि, इस मामले में हमारा स्कूल एक आदर्श विद्यालय है।

मैं जिस पूर्व माध्यमिक विद्यालय में पढ़ती हूं, वहां की पूरी तस्वीर स्वच्छता के आचरण को अपनाने से बदल गई है। हमारे स्कूल में पेयजल तथा सेनीटेशन की व्यवस्था अच्छी है। शौचालय की दरुगध को खत्म करने के लिए फिनायल का प्रयोग किया जाता है। यहां इंसीनरेटर भी बना है, जिसका प्रयोग छात्रएं उन दिनों के मुश्किल में समय करती हैं। इसके न होने से पहले विद्यालय में छात्रओं की उपस्थिति कम होती थी, लेकिन अब छात्रओं की हाजिरी लगभग शत-प्रतिशत रहती है। प्रशासन के सहयोग से अब हमारा विद्यालय अत्यंत स्वच्छ रहता है। ऐसी व्यवस्था यदि देश के सभी विद्यालयों में हो जाए तो छात्र-छात्रओं की उपस्थिति दर जरूर बढ़ेगी। हम सभी को समझना चाहिए कि यदि छात्रओं को शिक्षित करना है तो उन्हें स्कूल भेजना पड़ेगा। यदि स्कूल भेजना है तो वहां पर पृथक शौचालय, इंसीनरेटर, पेयजल जैसी व्यवस्थाएं होनी चाहिए। जिस तरह हमारे स्कूल ने यह कर दिखाया है, उसी तरह देश के सभी स्कूलों को प्रयास करने चाहिए। मुङो विश्वास है कि एक दिन गांवों तक के स्कूलों में शौचालय व इंसीनरेटर उपलब्ध होंगे और छात्रएं पढ़-लिखकर देश का नाम रोशन करेंगी।

आपकी माया मौर्या [कक्षा आठ, पूर्व माध्यमिक विद्यालय, ठटरा, वाराणसी]

बच्चियां उन दिनों में भी स्कूल जाने लगी हैं

राजकीय बालिका इंटर कॉलेज, विकास नगर की प्रधानाचार्या कुसुम वर्मा ने बताया कि 

एक समय था जबकि स्कूलों में लड़कियों के लिए अलग शौचालय नहीं होते थे। होते भी थे तो वह इस कदर गंदे होते थे कि उनका प्रयोग करना कठिन था। स्वच्छ भारत अभियान के तहत स्कूलों में शौचालय बने, जिसका सबसे अधिक लाभ बालिकाओं को मिला। अब उन्हें महीने के उन खास दिनों में केवल इसलिए कि स्कूल में शौचालय नहीं है, घर पर नहीं बैठना पड़ता। अब वे बगैर किसी संकोच के स्कूल जाती हैं। यह एक बहुत बड़ा बदलाव आया है। उम्मीद है कि आने वाले कुछ महीनों में स्थितियां और बेहतर होंगी।

यह एक आम दृश्य था कि शौचालयों में यूज्ड नैपकिन पड़े रहते थे। आज स्कूलों में इंसीनरेटर की व्यवस्था की जा रही है, जिससे इसका निस्तारण बहुत आसान हो गया है। न तो गंदगी इधर-उधर दिखाई देती है और न ही पर्यावरण अशुद्ध होता है। विदेशों में देखें तो कूड़ा प्रबंधन बहुत ही सिस्टमैटिक है। हर तरफ साफ-सफाई रहती है। देर से सही, हमें भी यह बात समझ में आ चुकी है। स्वच्छ भारत अभियान के जरिए ही लोगों में स्वच्छता की सोच विकसित हुई है। अच्छी बात यह है कि समाज के हर वर्ग में सहयोग की भावना भी जाग्रत हुई है। जहां तक पर्यावरण संरक्षण की बात है, विद्यालय परिसर में लोग पौधे रोपने का आग्रह करते हैं और खुशी-खुशी पौधे रोप कर जाते हैं।

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