केजीबीवी शिक्षकों को अब मिलेगा 17 हजार रुपये मासिक मानदेय, हाई कोर्ट ने दिए नियमितीकरण के निर्देश
इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालयों के शिक्षकों को बड़ी राहत दी है। कोर्ट ने ...और पढ़ें

HighLights
केजीबीवी शिक्षकों को अब 17 हजार रुपये मासिक मानदेय।
हाई कोर्ट ने पद स्वीकृत कर सेवा शर्तें नियमित करने को कहा।
शिक्षकों के नियमितीकरण पर भी विचार करने का निर्देश।
विधि संवाददाता, जागरण, लखनऊ। इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालयों (केजीबीवी) में कार्यरत शिक्षकों को बड़ी राहत दी है। न्यायमूर्ति पंकज भाटिया ने प्रदेश सरकार को चार माह के भीतर शिक्षकों के पद स्वीकृत अथवा सृजित करने और उनकी सेवा शर्तें नियमित शिक्षकों के समान बनाने का निर्देश दिया है।
अदालत ने नियमितीकरण के दावों पर भी शिक्षकों की शैक्षिक योग्यता और सेवा अवधि के आधार पर कानून के अनुसार विचार करने को कहा है। अर्चना बूध व अन्य की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए न्यायालय ने निर्देश दिया कि जब तक सरकार आवश्यक कदम नहीं उठा लेती, तब तक सभी केजीबीवी शिक्षकों को निर्णय की तारीख से 17 हजार रुपये प्रतिमाह मानदेय दिया जाए।
उन्हें निश्शुल्क व अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 की धारा 24(2) के तहत सेवा संबंधी संरक्षण भी मिलेगा।न्यायमूर्ति ने कहा कि शिक्षकों को वर्षों तक संविदा पर रखकर, पद सृजित किए बिना और नियमित शिक्षकों के समान वेतनमान दिए बिना काम कराना संविधान के अनुच्छेद 23 के तहत निषिद्ध जबरन श्रम के समान है। शिक्षकों को दिया जा रहा मानदेय अर्द्धकुशल श्रमिकों के निर्धारित पारिश्रमिक से भी कम है।
अदालत ने इसे मानदेय कहना क्रूर मजाक करार दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि शिक्षकों की सेवा शर्तें इंटरमीडिएट स्तर तक के नियमित शिक्षकों के समान होनी चाहिए। यह व्यवस्था केवल याचिकाकर्ताओं तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि सभी केजीबीवी शिक्षकों पर लागू होगी। मानदेय और वेतन में समय-समय पर संशोधन कर उन्हें सरकारी और सहायता प्राप्त विद्यालयों के शिक्षकों के वेतन एवं परिलब्धियों के अनुरूप लाने का भी निर्देश दिया गया है।
अदालत ने कहा कि केंद्र सरकार को सहमति के अनुसार खर्च में अपना हिस्सा देना होगा। हालांकि, केंद्र से धनराशि स्वीकृत नहीं होने का बहाना बनाकर राज्य सरकार आदेश के पालन से इन्कार नहीं कर सकती। राज्य सरकार पहले भुगतान कर बाद में केंद्र से उसका हिस्सा वसूल सकती है।
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न्यायालय ने कहा कि वंचित वर्गों की बालिकाओं को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने वाली योजना में शिक्षकों को लंबे समय तक अपर्याप्त वेतन और असुरक्षित सेवा में रखना संवैधानिक प्रविधानों के अनुरूप नहीं है।
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