लखनऊ (प्रियम वर्मा)। कुछ भीगे अल्फाजों के साथ कई दबे अरमान काउंटरफीट कुनकू की स्मिता का चेहरा बनते हैं और केयरगिवर में अधिकार के लिए किए संघर्ष को हमिंग बर्ड के जरिए निर्णय तक पहुंचाते हैं। आगे रोजाना के राज लक्ष्य की ओर इशारा करते हैं और कठिन डगर पर आए तमाम उतार चढ़ाव के बाद कहते हैं..एवरीथिंग इज फाइन।

दरअसल, इस तारतम्य के जरिए जागरण फिल्म फेस्टिवल की पहले दिन दिखाई जाने वाली उन फिल्मों का जिक्र है जिसने कुछ इसी तरह दर्शकों को बांधे रखा। शुक्रवार को राजधानी स्थित फन सिनेमा में शुरू हुए फिल्म फेस्टिवल की जो अपनी लोकप्रियता का इतिहास रचने को एक बार फिर तैयार है। फेस्टिवल का उद्घाटन प्राविधिक शिक्षा एवं स्वास्थ्य चिकित्सा मंत्री आशुतोष टंडन ने किया। इस मौके पर महापौर संयुक्ता भाटिया, जागरण के स्थानीय संपादक अभिजित मिश्र और महाप्रबंधक जे के द्विवेदी मौजूद रहे।

कुछ भीगे अल्फाजों के साथ जब कई किरदारों ने कहानी कहना शुरू किया तो कल्पनाशीलता और असल जिंदगी में फर्क करना जरा मुश्किल हो गया। ये कारवां ऐसे ही कई अनकहे विषयों की ओर ले गया और दर्शकों ने पूरा समय देकर इसका स्वागत किया। मुख्य अतिथि ने शहर को कलाकारों की विरासत बताया। कहा कि ऐसे फेस्टिवल पुराने दिनों की ओर ले जाते हैं। जागरण का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि फिल्मों के चयन की खूबसूरती अलग ही है। पूरे साल इसका इंतजार रहता है। फेस्टिवल के पहले दिन कुल आठ फिल्में दिखाईं गईं। खचाखच भरे हॉल के बीच सीढि़यों पर बैठे दर्शक क्लासिकल सिनेमा की लोकप्रियता को परिभाषित कर रहे थे। रोमांच सिर्फ सीटों और सीढि़यों तक सीमित नहीं था बल्कि गेट के बाहर लगी लाइनों से भी उत्साह साफ झलक रहा था। खास बात यह है कि बेशुमार जुटे दर्शकों में युवाओं की संख्या सबसे ज्यादा थी। इनमें थियेटर से जुड़े युवाओं के अलावा बड़ा हिस्सा कॉलेज के स्टूडेंट्स का था। जिन्हें भले ही रंगमंच पर अभिनय की समझ नहीं थी लेकिन अभिनय की पीछे छिपी कहानी और संदेश पूरी तरह साफ हो रहा था।

बेशकीमती हिस्सा उनके नाम

जब हिस्सों में बंटी आपकी जिंदगी में हर एक पल बेशकीमती होता है तो किसी अनजानी कहानी में झांकने के लिए कुछ घंटे देना बेहद अनमोल होता है। ऐसे ही अनमोल हिस्से के साथ शहर का युवा वर्ग कई अनछुए विषयों के वास्ते जागरण फिल्म फेस्टिवल में पहुंचे। गोमती नगर निवासी शेखर त्रिवेदी आर्ट फिल्मों को लेकर कहते हैं कि एक शॉर्ट फिल्म देखना मतलब एक किताब पढ़ना। बस इसमें खास बात यह है कि यह मनोरंजक भी होता है और अच्छा साथ भी मुकम्मल हो जाता है। ज्योति गुप्ता अपने बेटे के साथ फेस्टिवल का हिस्सा बनीं। कहती हैं कि मुझे तो गंभीर विषयों पर आधारित फिल्मों देखना शुरू से ही पसंद था, बेटे को भी ऐसी फिल्में देखने का शौक है। के सी गुप्ता के लिए जिंदगी एक रंगमंच है और क्लासिकल सिनेमा में भले ही हमारी नहीं पर किसी असल जिंदगी से रूबरू होने का मौका मिलता है।

Posted By: Jagran

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