लखनऊ, [सौरभ शुक्ला]। प्रदेश की जेलों में भले ही 1985 से किसी कैदी को फांसी न दी गई हो, लेकिन फंदे की रस्सी में आज भी मोम, घी, शहद और केमिकल का लेपन होता है। इसके बाद यह रस्सी मिट्टी के घड़े में रखी जाती है। इस लेपन ने रस्सी में न तो कीड़े लगते हैं और न ही वह खराब होती है। यह रस्सी पुरानी जेल रोड स्थित कारागार मुख्यालय के संग्रहालय में देख सकते हैं।

यह संग्रहालय काकोरी कांड के बलिदानी अशफाक उल्ला खां, राम प्रसाद बिस्मिल, ठाकुर रोशन सि‍ंह, राजेंद्र नाथ लाहिड़ी, चंद्रशेखर आजाद समेत तमाम क्रांतिवीरों की गाथाएं सुना रहा है। यहां उनकी स्मृतियां संजोयी गई हैं। क्रांतिवीरों के बर्तन, आटा चक्की, मशाल, चरखा और तमाम वस्तुएं भी रखी हैं। डीजी जेल आनंद कुमार ने बताया कि ब्रिटिश हुकूमत के समय क्रांतिकारियों को जिन जेलों में रखा जाता था, उनका निर्माण भी वे खुद ही करते थे। इसके लिए वे ईंटें भी पाथते थे। सन् 1885 के समय क्रांतिवीरों के द्वारा पाथी गई ईंटें भी यहां पर रखी हैं।

दस्तावेज और बेडिय़ां बता रहीं क्रांतिवीरों के दर्द की कहानी : संग्रहालय में 60-70 किलो की लोहे की बेडिय़ां और हथकडिय़ां भी हैं। क्रांतिकारियों को इन बेडिय़ों और हथकडिय़ों में बांधकर रखा जाता था। यहां अशफाक उल्ला खां, राम प्रसाद बिस्मिल, ठाकुर रोशन ङ्क्षसह व अन्य क्रांतिवीरों के अंतिम पत्र, जो उन्होंने देश के नौजवानों को संदेश देने के लिए लिखे। वे भी सुरक्षित हैं। लाहिड़ी, बिस्मिल और अशफाक उल्ला खां के जेल में दाखिले और फांसी दिए जाने के दस्तावेज भी रखे हैं।

'जेल संग्रहालय में बहुत सी दुर्लभ वस्तुएं संजों कर रखी हैं। इनके रख-रखाव पर विशेष ध्यान रखा जाता है। स्कूली बच्चों और आमजन के लिए इसके समय-समय पर खोला जाता है। यहां आने वाले छात्र-छात्राओं को संग्रहालय की वस्तुओं के बारे में जानकारी दी जाती है।  -आनंद कुमार, डीजी जेल

Edited By: Anurag Gupta