लखनऊ [अजय श्रीवास्तव]। लॉकडाउन में नौकरी चली गई। दो बच्चे और पत्नी का खर्च उठाना मुश्किल था। दर्द भी किसे बताते। ठेला लगा नहीं सकते हैं और किसी के आगे हाथ फैलाने की हिम्मत नहीं थी। बस बदलते दिन का इंतजार कर रहे थे कि तभी घर की घंटी बजी। देखा कि कोई हाथ में एक बड़ा सा पैकेट लिए खड़ा है। कुछ बोलने से पहले उन्होंने ही सवाल किया-आप परेशान हैं, हमे पता है, इसलिए मदद करने आए हैं। डबडबाई आंखों से उस शख्स ने यह पैकेट न चाहकर भी थाम लिया, क्योंकि पत्नी और बच्चों का उदास चेहरा देखा नहीं जा रहा था।

ऐसा ही एक अन्य परिवार है। घर में कार है, जो शो-पीस बन चुकी है। पति की मौत के बाद वह स्टेट्स सिंबल मात्र है। उस पर भी लॉकडाउन की मार ने परिवार को भुखमरी के कगार पर पहुंचा दिया। हाथ फैलाने में भी शर्म आ रही थी। ऐसे में इनके घर भी एक रोज अचानक घंटी बजी। हाथ में वही टोकरी, खाना-पीना और जरूरत का सामान था। पूरी सौम्यता से मदद महिला के हाथ में सौंप दी। विकास खंड निवासी युवक के साथ भी यही हुआ। पत्नी संग रहते हैं। सबकुछ ठीक था मगर, कोरोना का काल ऐसा आया कि नौकरी निगल गया। किसी तरह समय काटा मगर मकान के किराए ने चिंता बढ़ा दी। इस बीच इनके यहां भी कुछ लोगों ने दस्तक दी। जो भी बन पड़ा मदद की।

विश्वास खंड में रहने वाली एक युवती मॉल में काम करती थी। बंदी में उसे भी खाने के लाले पड़ गए। युवती ने फेसबुक पर अपना दर्द बयां किया और जिंदगी से जुदा होने का कमेंट डाला। उसकी गुहार रंग लाई। सरकार और समाजसेवी खामोश रहे मगर अदृश्य मददगारों की टीम से महिला सदस्य पहुंचीं। उसकी काउंसिलिंग की। मदद सौंपी। इस भरोसे के साथ कि निश्चिंत रहें, आपको समाज में शर्मिंदा नहीं होने देंगे...।

यह महज चंद उदाहरण हैं। लखनऊ के गोमतीनगर में कोरोना से जंग के बीच लॉकडाउन में मुश्किल से घिरे परिवारों को मुश्किल से उबारने के लिए ऐसे ही कुछ हाथ बढ़े हैं। मददगारों की यह टोली गोमतीनगर इलाके में सचमुच की सांता क्लाज बन चुकी है। लॉकडाउन के जिस मुश्किल दौर में कम्युिटी किचिन चल रहे थे, समाजसेवी गाजे-बाजे के साथ लोगों का दर्द बांटने के दावे कर रहे थे, तब इन्होंने अपने इलाके और आसपास के करीब 247 ऐसे जरूरतमंद परिवार चिन्हित किए, जो बेहद मुश्किल में घिरे थे।

पूरी प्रक्रिया बेहद खामोशी संपन्न हुई, सभी के मान-सम्मान की चिंता करते हुए। सर्वे में पता चला कि ये ऐसे परिवार थे, जिनके पास कुछ समय पहले तक कोई कमी नहीं थी। कुछ पर गाड़ी है। सभी पर मोबाइल फोन भी है। कलर टीवी और वाई-फाई चलाते थे। कुछ किराए के या कुछ पर खुद का मकान है लेकिन, कोरोना काल नौकरी निगल चुका है। इतना ही नहीं, सामाजिक प्रतिष्ठा के चलते मदद मांगने में भी असहज महसूस कर रहे है। ऐसे में यह टीम उनके घर तक पहुंची। कुछ इस तरह से मदद की ताकि किसी की प्रतिष्ठा को आंच न आए।

जानें टीम के बारे में : दैनिक जागरण ने जब इस बारे में जानकारी करनी चाही तो मददगारों की टोली पहले मना करती रही। हमारे काफी कहने पर पहचान उजागर करने को राजी हुए। यह टीम गोमतीनगर जनकल्याण महासमिति ने बनाई है। इसके महासचिव महासचिव राघवेंद्र शुक्ल और सचिव रूप चंद्र शर्मा कहते हैं कि गा-बजाकर मदद की तो क्या किया..? हर किसी का मान सम्मान है। हमने लॉकडाउन में निराश्रित और झोपड़पट्टी में रहने वालों को भोजन और राशन को भिजवाने से शुरुआत की थी।

यह अभियान निरंतर चल रहा था लेकिन, मुसीबत के मारों की यह सिर्फ एक तस्वीर थी। हमें पता चला कि हमारे आसपास किराए या अपने मकान में रहने वाले भी तमाम ऐसे लोग हैं, जो दाने-दाने को मोहताज है। वह कुछ कह भी नहीं पा रहे हैं। तभी हमने सर्वे करके ऐसे लोगों को ढूंढा। उनके आसपड़ोस के लोगों से जानकारी जुटाई। फिर उनके राशन पानी का इंतजाम कराना प्रांभर किया। हमने हर खंड में किसी न किसी पदाधिकारी के घर पर राशन किट उपलब्ध करा रखी है, जहां से ऐसे लोगों को राशन अब भी पहुंचाया जा रहा है।

Posted By: Umesh Tiwari

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