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हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ का आदेश, गर्भ में पांच माह से अधिक के बच्चे की मौत पर अलग मुआवजा दे रेलवे

Published: Fri, 25 Sep 2026 06:22 PM (IST)

Allahabad High Court Lucknow Bench: इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि मां के ...और पढ़ें

इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ

 इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ 

HighLights

  1. हाईकोर्ट ने कहा- गर्भस्थ शिशु को भी माना जाएगा स्वतंत्र बच्चा

  2. रेलवे को आठ लाख रुपये अतिरिक्त का भुगतान करने का आदेश

विधि संवाददाता, लखनऊ। इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने पांच माह से अधिक समय के भ्रूण को भी काफी विकसित माना और रेलवे को महिला की मौत पर अतिरिक्त मुआवजा देने का आदेश दिया। यह आदेश ट्रेन से दुर्घटना मृत सावित्री देवी के परिवार के सदस्यों की दायर अपील पर आया।

न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार ने यह फैसला अशोक कुमार व अन्य की ओर से दाखिल अपील को मंजूर करते हुए पारित किया है। महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि मां के गर्भ में पांच माह से अधिक उम्र के बच्चे को जन्म लेने तक कानून की नजर में अस्तित्व में मौजूद बच्चे के समान माना जा सकता है।

दुर्घटना में गर्भस्थ बच्चे की मौत होने पर उसे अलग व्यक्ति मानते हुए क्षतिपूर्ति का दावा किया जा सकता है। कोर्ट ने कहा कि गर्भ में पल रहा भ्रूण भी एक स्वतंत्र जीवन है और उसकी मृत्यु वास्तव में बच्चे की क्षति है।

लखनऊ बेंच ने कहा है कि रेल दुर्घटना में पांच महीने से ज़्यादा की गर्भावस्था वाले, काफी विकसित भ्रूण की मौत को बच्चे की मौत माना जाएगा और इसके लिए रेलवे को अलग से मुआवजा दिया जाना चाहिए। जस्टिस प्रशांत कुमार ने रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल, लखनऊ के 26 सितंबर, 2023 के आदेश को रद कर दिया और रेलवे को निर्देश दिया कि वह उस सात महीने के भ्रूण की मौत के लिए अतिरिक्त 8 लाख रुपये का मुआवजा दे, जो उस महिला के गर्भ में था जिसकी ट्रेन से गिरने के बाद मौत हो गई थी।

सावित्री 13 जून, 2017 को अपने दो बेटों के साथ सीतापुर कैंट से बिसवां रेलवे स्टेशन तक जन साधारण एक्सप्रेस से यात्रा कर रही थीं। बिसवां स्टेशन पर ट्रेन से उतरते समय वह गिर गईं और उन्हें गंभीर चोटें आईं, जिससे उनकी मौत हो गई।

वह लगभग सात महीने की गर्भवती थीं और भ्रूण की भी मौत हो गई। उनके परिवार ने मुआवजे के लिए रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल का दरवाजा खटखटाया। ट्रिब्यूनल ने अजन्मे बच्चे के लिए अलग से मुआवजा देने से इनकार कर दिया और कहा कि रेलवे एक्ट के तहत भ्रूण को वास्तविक यात्री नहीं माना जा सकता।

इसके बाद सावित्री के परिवार के लोग हाई कोर्ट पहुंचे। लखनऊ बेंच ट्रिब्यूनल के दृष्टिकोण से सहमत नहीं था और उसने कहा कि मुआवजा तय करने के लिए काफी विकसित भ्रूण की मौत को बच्चे की मौत माना जा सकता है।

बेंच ने कहा कि रेलवे एक्ट में "भ्रूण" शब्द का विशेष रूप से ज़िक्र न होने का मतलब यह नहीं है कि रेलवे रेल दुर्घटना या किसी अप्रिय घटना से हुई मौत के मामलों में एक्ट की धारा 124-A के तहत अपनी कानूनी जिम्मेदारी से बच सकता है।

कोर्ट ने यह भी कहा कि मुआवजे के मकसद से मां और अजन्मे बच्चे की मौत को एक ही नुकसान नहीं माना जा सकता। अदालत ने कह कि चूंकि सावित्री सात महीने की गर्भवती थीं, इसलिए अजन्मे बच्चे के लिए अलग से मुआवजा दिया जाना चाहिए।

कोर्ट ने रेलवे को दावा करने वालों को अतिरिक्त आठ लाख रुपये देने का निर्देश दिया। कोर्ट ने कहा कि यह रकम ‘रेलवे दुर्घटना और अप्रिय घटना (मुआवजा) नियम, 1990’ की संशोधित अनुसूची के तहत तय मुआवज़े के अनुसार है और अपील को मंज़ूरी दे दी।

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