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हड़प्पा कालीन मनकों में धड़क रही छह पीढ़ियों की विरासत, लखनऊ के अनवर तराश रहे लाजवर्द और कार्नेलियन

Published: Sat, 24 Oct 2026 06:56 AM (GMT+05:30)Updated: Sat, 24 Oct 2026 07:00 AM (GMT+05:30)

अनवर हुसैन शेख का परिवार छह पीढ़ियों से हड़प्पाकालीन मनका निर्माण कला को जीवित रखे हुए है। लखनऊ में आयोजित ...और पढ़ें

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HighLights

  1. अनवर हुसैन का परिवार छह पीढ़ियों से मनका कला सहेज रहा।

  2. लखनऊ कार्यशाला में लाजवर्द, कार्नेलियन से मनके बनाने की तकनीक सिखाई।

  3. प्रतिभागियों ने पत्थरों में छेद करने, पॉलिशिंग की विधि सीखी।

आशुतोष पांडेय, लखनऊ। हड़प्पा और सिंधु-सरस्वती सभ्यता की प्राचीन मनका निर्माण कला आज भी पारंपरिक शिल्पकारों के हुनर से जीवित है। गुजरात के खंभात के अनवर हुसैन शेख का परिवार छह पीढ़ियों से इस कला को सहेज रहा है। वर्ष 2003 में तत्कालीन राष्ट्रपति डा. एपीजे अब्दुल कलाम ने उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया था।

उत्तर प्रदेश राज्य पुरातत्व निदेशालय, संस्कृति विभाग की ओर से आयोजित प्राचीन मनका निर्माण तकनीक की कार्यशाला में अनवर हुसैन ने पत्थरों के चयन, तराशने, आकार देने और उनमें छेद करने की प्रक्रिया समझाई। उन्होंने बताया कि मनका निर्माण में कारीगर का अनुभव, कौशल और धैर्य महत्वपूर्ण है।

लाजवर्द और कार्नेलियन की खासियत

अनवर हुसैन के अनुसार, लाजवर्द (लैपिस लाजुली) अफगानिस्तान में मिलता है, जबकि कार्नेलियन गुजरात के राजपीपला और झगड़िया क्षेत्र में पाया जाता है। खंभात पारंपरिक मनका निर्माण के लिए प्रसिद्ध है। यहां पत्थरों से गोल मनके, हड़प्पाकालीन शैली के आभूषण और हार के लिए विभिन्न आकृतियां तैयार की जाती हैं।

सहायक पुरातत्व अधिकारी गौरव के अनुसार, कच्चे कार्नेलियन की कीमत करीब 800 रुपये और लाजवर्द की 1300 रुपये प्रति किलो है। अगेट लगभग 125 रुपये प्रति किलो मिलता है। तराशने और डिजाइन तैयार करने के बाद आभूषणों की कीमत उनकी कारीगरी के अनुसार तय होती है। कार्नेलियन, बैंडेड अगेट, जैस्पर, क्वार्ट्ज, अमेथिस्ट और स्फटिक जैसे पत्थरों का इस्तेमाल आभूषणों के अलावा सजावटी वस्तुएं बनाने में भी किया जाता है।

छह पीढ़ियों से आगे बढ़ रही परंपरा

अनवर हुसैन ने बताया कि उनके दादा को वर्ष 1971 में इंदिरा गांधी के कार्यकाल में प्रमाणपत्र मिला था, जबकि उनके पिता को वर्ष 1987 में राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। परिवार की पीढ़ियां इस पारंपरिक शिल्प को आगे बढ़ाती रही हैं।

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अब वह अपने बेटों को भी इसकी बारीकियां सिखा रहे हैं।
उन्होंने अपने सहयोगी प्रताप भाई के साथ 'मोहनजोदड़ो' फिल्म के लिए काम किया है। बीबीसी, नेशनल ज्योग्राफिक और डिस्कवरी चैनल से जुड़े कार्यों में भी उनकी भागीदारी रही है। उनका प्रयास मनका निर्माण की प्राचीन तकनीक को अगली पीढ़ी तक पहुंचाना है।

प्रतिभागियों ने सीखी प्राचीन तकनीक

कार्यशाला में शामिल अंजलि वाजपेयी ने कहा कि अनवर हुसैन से पत्थरों में छेद करने, पॉलिशिंग और ग्राइंडिंग की तकनीक सीखना नया अनुभव रहा। प्रत्यक्ष अभ्यास से किताबी ज्ञान को समझने में मदद मिली। लखनऊ विश्वविद्यालय की छात्रा वर्षा ने पत्थर से तीर की नोक और हस्तकुठार का लघु रूप बनाना तथा मनकों में छेद करना सीखा। उन्होंने कहा कि ऐसी कार्यशालाओं से छात्रों को व्यावहारिक ज्ञान मिलता है। विद्यार्थियों को पुरातात्विक उत्खनन में भी अवसर दिए जाने चाहिए। कार्यशाला के समापन पर प्रतिभागियों को प्रमाणपत्र प्रदान किए गए।