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'गुंडा एक्ट निर्दोषों के उत्पीड़न का हथियार नहीं,' हाई कोर्ट ने निरस्त किया अफसर का आदेश

Published: Sun, 13 Sep 2026 04:38 AM (IST)

इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने गुंडा एक्ट के दुरुपयोग पर टिप्पणी करते हुए कहा कि यह निर्दोषों के ...और पढ़ें

प्रतीकात्मक तस्वीर।

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HighLights

  1. हाई कोर्ट ने गुंडा एक्ट के दुरुपयोग पर सख्त टिप्पणी की।

  2. कहा, यह कानून निर्दोषों के उत्पीड़न का हथियार नहीं है।

  3. गोंडा निवासी जाहिद अली का निष्कासन आदेश रद्द किया।

जागरण संवाददाता, लखनऊ। इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने गुंडा एक्ट के दुरुपयोग पर टिप्पणी करते हुए कहा कि इस कानून का इस्तेमाल निर्दोषों के उत्पीड़न के हथियार के रूप में नहीं किया जा सकता। गुंडा एक्ट शक्तिशाली कानून है और इसे केवल बेहद स्पष्ट मामलों में, सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए सावधानी से लागू किया जाना चाहिए।

ऐसे मामलों से संकेत मिलता है कि इस कानून के इस्तेमाल में आवश्यक सतर्कता नहीं बरती जा रही है।न्यायमूर्ति सुभाष विद्यार्थी ने गोंडा निवासी जाहिद अली को गुंडा घोषित करने और छह माह के लिए जिले से निष्कासन के जिलाधिकारी के आदेश और आयुक्त के आदेश को निरस्त कर दिया।

जिलाधिकारी ने 11 मई को गुंडा एक्ट की धारा 3(1) के तहत यह कार्रवाई की थी। आधार में दो मुकदमों और एक बीट सूचना रिपोर्ट का उल्लेख था। एक मामला 2010 का और दूसरा 2020 का था। कोर्ट ने पाया कि 2010 के मामले में जाहिद अली को मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, गोंडा ने 2017 को ही बरी कर दिया था। कोर्ट ने कहा कि दोषमुक्त व्यक्ति के खिलाफ उसी मुकदमे को आधार नहीं बनाया जा सकता।

2020 के मामले और 2026 में गुंडा घोषित किए जाने के बीच छह वर्ष का अंतर है। दोनों के बीच तर्कसंगत संबंध नहीं बनता।कोर्ट ने पुलिस की बीट सूचना रिपोर्ट को भी पर्याप्त आधार मानने से इन्कार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि सूचना पर मुकदमा दर्ज नहीं हुआ और जाहिद को सुनवाई का अवसर भी नहीं मिला।

ऐसी रिपोर्ट के आधार पर कार्रवाई करना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत होगा। आयुक्त द्वारा बरी किए जा चुके मुकदमे को लंबित मामलों में शामिल करना भी कोर्ट ने विवेक के अभाव का उदाहरण माना। न्यायालय ने कहा कि महज 2020 के एक आपराधिक मामले में संलिप्तता से किसी व्यक्ति को आदतन अपराधी नहीं माना जा सकता।

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