लखनऊ [दीप चक्रवती]। समुद्र जब-जब मथा जाएगा, वह रत्न उगलेगा। ये मथने वालों के सामथ्र्य और साथ ही साथ निष्ठा पर निर्भर है कि अंतिम टान तक इतना जोर लगाया जा सके कि अमृतकलश निकल आए। साहित्य के स्वर्णयुग के कालनिर्धारण के लिए संवादी के मंच पर जब साहित्य का समुद्र मथा गया, तो निष्कर्षों के कई रत्न निकलकर आए। प्रश्न से आरंभ हुई यात्रा ने निस्संदेह प्रश्न पर ही आकर विराम लिया, लेकिन इस दरम्यान कई अनुत्तरित प्रश्न हल हो गए। हालांकि बीच में विषयांतरों के भी कई पड़ाव आए, पर मूल विषय कभी नेपथ्य में नहीं गया और यही संवाद की सार्थकता भी रही।

साहित्य का स्वर्णकाल सत्र की जब शुरुआत हुई तो मंच पर साहित्य की तीन पीढिय़ां मौजूद थीं। राजेंद्र राव, शैलेंद्र सागर, अमरीक सिंह दीप और रत्नेश्वर सिंह। सूत्रधार अनंत विजय अपने पहले सवाल के साथ सीधे मुद्दे पर आए। कहा कि पुराने समय में इतने माध्यम नहीं थे, आज माध्यम अधिक हैं तो लेखकों के पास अवसर भी ज्यादा हैं। तो क्या इस लिहाज से वर्तमान समय साहित्य का स्वर्णकाल कहा जा सकता है? जवाब रत्नेश्वर ने दिया। कहा, एक नए स्वर्णकाल का दरवाजा खुल चुका है, यह हमें स्वीकार कर लेना चाहिए। दुनिया में आज सबसे ज्यादा गंभीर विषय पर्यावरण है। यह साहित्य के सामने सबसे बड़ी चुनौती है कि हम इस विषय पर रचनाएं करें। कहने का तात्पर्य कि लेखन के लिए सर्वाधिक गंभीर विषय हमारे पास है और इस पर अगर लिखा जाता है तो निश्चित तौर पर वह स्वर्णिम लेखन होगा।

शैलेंद्र सागर ने स्वर्णकाल के निर्धारण पर सवाल उठाए। पूछा कि वे कौन से मानदंड हैं जिन पर हम किसी कालखंड को स्वर्णयुग का दर्जा देंगे। एक तो लेखन का स्तर। साथ ही यह भी जरूरी है कि जनमानस तक इसकी पहुंच कितनी है। अगर लेखन जनमानस को किसी भी प्रकार से प्रभावित नहीं कर रहा है तो यह स्वर्णकाल में सबसे बड़ी बाधा है। शैलेंद्र ने कहा कि लखनऊ में जब यशपाल, भगवतीचरण वर्मा और अमृतलाल नागर की त्रयी का समय था, वह समय साहित्य का स्वर्णकाल कई मायनों में कहा जा सकता है।

तब ग्लैमर ज्यादा था, अब कम है

राजेंद्र राव ने कहा कि साहित्य का स्वर्णकाल वही हो सकता है जब समाज में साहित्य हाशिये पर न हो। इस पर अलग-अलग राय हो सकती है कि कौन सा युग स्वर्णकाल हो सकता है। बात उल्टी लग सकती है लेकिन जब लेखक चिट्ठी के माध्यम से अपनी रचनाएं भेजते थे और जब वे छप जाती थीं तो उसे हर कोई पहचानने लगता था। कई साहित्यिक मंचों पर उनका परिचय देने की जरूरत भी नहीं होती थी। उस वक्त साहित्यकारों की फोटो ब्लैक एंड व्हाइट छपती थी, लेकिन उनकी पहचान बड़ी रंगीन होती थी।

बेस्टसेलर को लेकर विवाद

राजेंद्र राव व शैलेंद्र सागर, दोनों की यही राय थी कि बेस्ट सेलर की मापदंड रचना की उत्कृष्टता का मानक नहीं हो सकता। कोई किताब ज्यादा बिकी है इससे यह तो तय नहीं हो जाता कि वह स्तरीय है। वहीं आज के पाठक को लेकर रत्नेश्वर काफी आशावादी हैं। अपना अनुभव सुनाया कि पटना में लगने वाले पुस्तक मेले में एक बार जब नामवर सिंह पहुंचे तो उन्हें सुनने के लिए पांच हजार लोग खड़े थे। तब नामवर सिंह ने कहा था कि यहां आने से पहले मैं मर जाता तो भी यह दृश्य देखने के लिए मेरी आंखें खुली रहतीं। मेले में लाखों लाख लोग आते हैं। इसका मतलब है कि पाठक अभी जीवंत है, बशर्ते आप उसे नया पढऩे को दें।

खिच्चा और पकी आंखों का अंतर

रत्नेश्वर ने कहा कि आज का पाठक खिच्चा आंखों का है। मतलब उसकी आंख में नया पानी है, उसके देखने का तरीका ही दूसरा है। हमें उस तक पहुंच बनानी होगी। इस पर अनंत विजय ने कहा कि नामवर सिंह ने पकी आंखों का समालोचन किया था, यह खिच्चा आंखों का नजरिया भी जरूरी है।

300 प्रतियों के आंकड़े पर बहस

संवाद के दौरान जब शैलेंद्र सागर ने कहा कि आजकल प्रकाशक कई रचनाओं की सिर्फ 300 प्रतियां छापते हैं। लखनवियों का मिजाज देखिए कि इस पर दीर्घा से आपत्तियां आ गईं। लोगों ने कहा कि 300 प्रतियों में लागत नहीं निकल सकती, इसलिए यह आंकड़ा सही नहीं हो सकता। बहरहाल, स्वर्णकाल के निर्धारण का कोई सर्वस्वीकार्य उत्तर तो नहीं मिला पर यात्रा का आनंद जितना वक्ताओं ने उठाया उतने ही श्रोताओं ने। हम सबका अपना-अपना मिजाज है और अपना-अपना स्वर्णकाल। बावजूद इसके निष्कर्ष के तौर पर आप यह दृष्टांत ले सकते हैं कि साहित्य का स्वर्णकाल हमेशा भविष्य में होगा, क्योंकि पिछले से अच्छा लिखे जाने की संभावना हमेशा रहती है और रहेगी। बात निकली थी और दूर तलक गई भी। 

Posted By: Divyansh Rastogi

डाउनलोड करें जागरण एप और न्यूज़ जगत की सभी खबरों के साथ पायें जॉब अलर्ट, जोक्स, शायरी, रेडियो और अन्य सर्विस