लखनऊ, जागरण संवाददाता। स्तनधारी जनवरों के काटने पर आप रैबीज की वैक्सीन जरूर लगवाएं। आपकी छोटी सी लापरवाही जानलेवा हो सकती है। श्वान, बंदर, सियार व बिल्ली के काटने पर तुरंत चिकित्सक से संपर्क करें। झाड़फूंक कराने के बजाए चिकित्सक से मिलें। इनके काटने पर रेबीज का वायरस सीधे ब्रेन पर अटैक करता है। वहीं बीमारी गंभीर होने पर मरीज की जान बचाना भी मुश्किल हो जाता है। बलरामपुर अस्पताल के एआरवी सेंटर के प्रभारी डा. विष्णुदेव विश्व रेबीज दिवस के तहत जानकारी दे रहे थे।

उन्होंने बताया कि वैसे तो रेबीज से संक्रमित जानवरों की तादाद पांच फीसद के करीब ही होती है, लेकिन इन जानवरों के चपेट में आने के बाद वैक्सीनेशन बेहद महत्वपूर्ण है। भूलवश यदि व्यक्ति में रेबीज का संक्रमण हो गया तो फिर यह लाइलाज ही है। हर साल 27 व 28 सितंबर को लोगों को जागरूक करने के लिए विश्व रेबीज दिवस मनाया जाता है। शहर में हर दिन 300 से 350 लोगों को जानवर काट रहे हैं और उन्हें वैक्सीन लगाई जा रही है।

तंत्रिका तंत्र पर करता है हमला: डा. विष्णुदेव ने बताया कि रेबीज संक्रमित जानवर के काटने से यह खतरनाक वायरस पेरीब्रल नर्व के माध्यम से व्यक्ति के तंत्रिकातंत्र (सीएनएस) पर हमला करते हुए ब्रेन तक पहुंच बना लेता है.इससे पीड़ित व्यक्ति के मस्तिष्क की मांसपेशियों में सूजन आने के साथ स्पाइनल कार्ड भी प्रभावित हो जाती है। व्यक्ति में इंसेफ्लाइटिस जैसी स्थिति हो जाती है और वह कोमा में चला जाता है और उसका निधन हो जाता है।

रेबीज संक्रमण के लक्षण: डा. विष्णुदेव के मुताबिक व्यक्ति में रेबीज का संक्रमण फैलने पर फोटोफोबिया, थरमोफोबिया, हाइड्रोफोबिया व एयरोफोबिया से ग्रसित हो जाता है। ऐसे में व्यक्ति चमक यानी की रोशनी से भागता है। अधिक गर्मी होने पर भी खुद में असहज महसूस करता है। पानी से दूर भागता है। तेज हवा भी बर्दाश्त नहीं कर पाता। संक्रमण से व्यक्ति जानवर की भांति ही हिंसात्मक व आक्रामक हो जाता है। भूख कम हो जाती है, खाना-पीना बंद कर देता है। सांस लेने पर हांफने की आवाज के साथ सलाइवा बाहर निकलनी लगती है। व्यक्ति में बुखार सिर दर्द, उल्टी, चक्कर आना व शारीरिक कमजोरी आना समेत आदि लक्षण होते हैं।

सावधानी ही बचाव है: डा.विष्णु देव ने बताया कि थोड़ी सावधानी बरत लें तो 80 फीसदी संक्रमण का खतरा टल जाता है.जैसे श्वान, बंदर व बिल्ली आदि स्तनधारी जानवरों के काटने से पीड़ित व्यक्ति को डिटरजेंट साबुन के पानी से घाव को 15 मिनट तक धुलना चाहिए। घाव पर पिसी मिर्च, मिट्टी का तेल, चूना, नीम की पत्ती, एसिड आदि का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। घाव धोने के बाद एंटीसेप्टिक क्रीम, लोशन, डेटाल, स्प्रिट व बीटाडीन लगाया जा सकता है। घाव खुला छोड़ दें, अधिक रक्त स्त्राव होने पर साफ पट्टी बांध सकते हैं। टांके न लगवाएं। श्वान के काटने पर उस पर दस दिन तक निगरानी बनाए रखें, यदि वह जिंदा है तो संक्रमण का खतरा नहीं है।

 

Edited By: Rafiya Naz