लखनऊ, जेएनएन। बच्चों में जन्मजात विकृतियों का ग्राफ बढ़ा है। खासकर, जननांग-गुप्तांग का विकसित न होने का डिसऑर्डर बड़ी चुनौती है। कई केस में लड़का-लड़की का भेद करना मुश्किल हो जाता है। मगर, इन सभी में प्लास्टिक सर्जरी के जरिए अंगों को विकसित किया जा सकता है।

केजीएमयू के प्लास्टिक सर्जरी विभाग में शनिवार को 43वां स्थापना दिवस मनाया गया। इस दौरान सुपर स्पेशियलिटी पिडियाट्रिक हॉस्पिटल  नोएडा के निदेशक प्रो. डीके गुप्ता ने इंटर सेक्स डिसऑर्डर पर व्याख्यान दिया। उन्होंने कहा कि 1500 जन्म लेने वाले बच्चों में से एक इंटर सेक्स डिसआर्डर से पीडि़त होता है। इनमें कई बार लड़का व लड़की में अंतर स्पष्ट कर पाना मुश्किल होता है। ऐसे में अल्ट्रासाउंड, सीटी स्कैन जांच की मदद लेनी चाहिए। इससे बच्चे काआंतरिक हिस्सा बालक व बालिका का स्पष्ट हो जाएगा। यह कंफर्म होने पर मेडिकल व सर्जरी ट्रीटमेंट का प्लान करना चाहिए। विभागाध्यक्ष डॉ. एके सिंह ने कहा कि प्लास्टिक सर्जरी के जरिए इंटर सेक्स डिसऑर्डर की दिक्कतों को दूर करना संभव है। कम उम्र में सर्जरी करने से रिकवरी बेहतर होगी। 

माइक्रो सर्जरी से किया प्रशिक्षित

डॉ. एके स‍िंह ने कहा कि विभाग में माइक्रो सर्जरी स्किल लैब के जरिए करीब 20 चिकित्सकों को प्रशिक्षित किया गया है। इस दौरान  पूर्व प्रोफेसर डॉ. एसडी पांडेय, डॉ. रमेश चंद्र, अयोध्या मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डॉ. विजय कुमार ने भी विचार व्यक्त कि

 

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Posted By: Anurag Gupta

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