लखनऊ [रूमा सिन्हा]। आप इस भ्रम में तो नहीं कि सबमर्सिबिल व नलकूप का शुद्ध पानी पी रहे हैं। यदि हां, तो सावधान हो जाएं। कारण यह है कि केंद्रीय भूजल बोर्ड, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, भारतीय विष विज्ञान अनुसंधान संस्थान, जल निगम सहित अन्य विभागों द्वारा समय-समय पर किए गए अध्ययन इस बात का प्रमाण हैं कि राजधानी के भूगर्भ जल स्रोतों में आर्सेनिक, आयरन, नाइट्रेट, मैग्नीशियम, कीटनाशकों के साथ फीकल कॉलीफार्म बैक्टीरिया मौजूद हैं। साफ है कि ऐसे में सबमर्सिबिल हो या नलकूप इनसे निकलने वाला पीने का पानी कतई शुद्ध नहीं। यह चिंता इसलिए है कि शहर में अस्सी फीसद पेयजल आपूर्ति भूगर्भ जल स्रोतों जैसे नलकूप व सबमर्सिबिल पर आधारित है। भारतीय मानक ब्यूरो (बीआइएस) द्वारा राजधानी लखनऊ के पेयजल नमूनों पर जारी रिपोर्ट कतई चौंकाने वाली नहीं है। दरअसल, एक बार फिर जिम्मेदार एजेंसियां जो लखनऊ में जल स्रोतों में मौजूद भारी धातुएं व रसायनों को लेकर बेपरवाह बनी हुई हैं उन्हें चेत जाना चाहिए। चूंकि बीआइएस जैसी केंद्रीय संस्था ने एक बार फिर यह खुलासा किया है कि लखनऊ में पानी पीने योग्य नहीं है। 

कहां क्या मिला 

भारतीय विष विज्ञान अनुसंधान संस्थान द्वारा गोमती नगर के विनय खंड, विनीत खंड, विराम खंड में सबमर्सिबिल नमूनों में टोटल व फीकल कॉलीफार्म बैक्टीरिया की पुष्टि की गई है।   

केंद्रीय भूमिजल बोर्ड द्वारा की गई जांच में 12 फीसद नमूनों में नाइट्रेट की मात्रा मानक 45 मिग्रा.प्रति लीटर से अधिक मिली है। 

निराला नगर, इंदिरा नगर, चौक, कैंपवेल रोड व बुलंद बाग में भी नाइट्रेट मानक से अधिक पाया गया है। सिटी स्टेशन के पास बुलंद बाग में नाइट्रेट 244 मिग्रा.प्रति लीटर के खतरनाक स्तर में मिला था। 

कुछ नमूनों में फ्लोराइड की मात्रा भी भारतीय मानक 1.5 मिग्रा. प्रति लीटर के मुकाबले अधिक पाई गई है। पुरानी जेल के पीछे स्थित तुलसी पार्क के नमूने में फ्लोराइड 1.59 व लखनऊ विश्वविद्यालय परिसर में 1.66 मिग्रा.प्रति लीटर मिला।  

आइआइटीआर द्वारा चिनहट क्षेत्र में जल नमूनों की जांच की गई जिसमें कीटनाशकों की मौजूदगी पाई गई।  

जलकल विभाग के  पूर्व महाप्रबंधक राजीव बाजपेई ने बताया कि भूजल की गहन वैज्ञानिक पड़ताल जरूरी है। इस संबंध में न शासन गंभीर है और न ही समाज जागरूक। भूजल प्रदूषण तेजी से बढ़ रहा है। वहीं नदियां भी प्रदूषित हैं। जिसका मन आया बगैर जांच जलापूर्ति शुरू कर दी। ऐसे में स्वच्छ पानी की कल्पना व्यर्थ है। वहीं ओडीएफ के तहत बन रहे शौचालय आने वाले समय में भूजल प्रदूषण की बड़ी वजह बनेंगे। 

 

Posted By: Anurag Gupta

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