लखीमपुर, [विकास सहाय]। संकटा देवी मंदिर पौराणिक ही नहीं बल्कि उन तीन शक्तिपीठों में से एक मानी जाती हैं, जो भगवान श्रीकृष्ण के द्वारा स्थापित हैं, संकटा देवी शहर की कुलदेवी के रूप में रेलवे स्टेशन से लगभग 500 मीटर की दूरी पर स्थापित हैं। माता लक्ष्मी की स्थापना होने के कारण ही इन्हीं के नाम पर बाद में शहर लक्ष्मीपुर बसा जो कालांतर में लखीमपुर हुआ। विशालकाय भव्य गुंबद, वृक्षों के विशाल झुरमुट के बीच लाउडस्पीकर से आती मंत्रोच्चार की ध्वनि दूर से ही कुलदेवी संकटा देवी के विराट दरबार की सूचना देती है।

यहां भोर की पहली किरण के साथ रात ढलने तक भक्तों के समूह गाते, बजाते स्तुति करते जप और पूजा पाठ करते दिखाई देते हैं। इसका विशाल परिसर मंत्रोच्चार से गूंजता रहता है। दूर-दूर तक प्रसिद्ध संकटा देवी का मंदिर शुरू से महेवा स्टेट के राज परिवार के संरक्षण में रहा है। राज परिवार के लोग न केवल इस मंदिर का संरक्षण करते हुए इसमें सहयोग करते हैं बल्कि वे पूजा-पाठ के लिए भी यहां आते रहते हैं।

द्वापर युगीन है संकटा देवी मंदिर

संकटा देवी मंदिर द्वापर युगीन बताया जाता है, यहां के मुख्य पुरोहित अंकुर शुक्ल बताते हैं कि वह पिछले 10 वर्षों से यहां मंदिर की सेवा कर रहे हैं, इससे पहले उनके पिता कन्हैया लाल शुक्ल भी मंदिर के मुख्य पुरोहित थे। वे बताते हैं कि ऐसी मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण ने महाभारत के युद्ध के बाद यहां पर तीन शक्तिपीठ की स्थापना की थी, जिसमें संकटा देवी, बंकटा देवी व शीतला देवी की शक्तिपीठ हैं। इसमें संकटा देवी प्रमुख हैं।

अंकुर शुक्ला के मुताबिक महाभारत के युद्ध के बाद जब श्री कृष्ण पशुपतिनाथ की यात्रा के लिए नेपाल जा रहे थे तो यहां के वनाच्छादित प्रदेश में रुक्‍मणी ने पूजा करने की इच्छा प्रकट की। इस पर भगवान कृष्ण ने यहां विशाल जलाशय के किनारे माता लक्ष्मी, माता सरस्वती तथा माता दुर्गा की मूर्तियों की स्थापना की। माता लक्ष्मी कालांतर में संकट को टालने वाली, संकटा देवी के नाम से प्रसिद्ध हुईं।

माता सरस्वती बंकटा देवी के नाम से और माता दुर्गा शीतला देवी के नाम से प्रसिद्ध हुई। नहीं तो बाद में शीतला देवी और संकटा देवी के मंदिरों को राजपरिवार ने संरक्षण देकर इन्हें विशालकाय और भव्य स्वरूप दिया। आज भी संकटा देवी के दरबार में दोनों नवरात्रि देवी जागरण के भव्य आयोजन होते हैं। आसपास के जिलों से लोग संकटा देवी के दरबार में पूजा अर्चना करने आते हैं। इसके विशाल परिसर में लोग विवाह, मुंडन संस्कार, अन्नप्राशन व नामकरण समेत अनेक संस्कार भी करवाते हैं।

पांच वक्त होती है मंदिर में आरती : पुरोहित अंकुर शुक्ला बताते हैं कि मंदिर में पांच बार आरती होती है, पहली आरती सुबह पांच बजे मंगल आरती, फिर दूसरी सुबह 7:30 बजे, माता संकटा देवी का, फूलों से भव्य श्रृंगार करके, फिर दोपहर 12:30 बजे मंदिर बंद होने पर, इसके बाद 6:30 बजे मंदिर खुलता है, तब चौथी आरती 7:30 बजे होती है फिर रात में 9:30 बजे शयन आरती के बाद मंदिर बंद कर लिया जाता है। अंकुर बताते हैं कि इनके अलावा तीन और पुरोहित हैं, भक्तों की एक आरती समिति भी है,जो मंदिर में सुबह शाम आरती कराती है।

Edited By: Anurag Gupta