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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Mar 21, 2024 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

सीएम योगी आदित्यनाथ के प्रयासों से पराली जलाने के मामलों में आई कमी, व्यापक जागरूकता अभियान चला रही सरकार

Published: Thu, 21 Mar 2024 11:41 PM (IST)

शोधों से साबित हुआ है कि बचे डंठलों में एनपीके की मात्रा क्रमश 0.5 0.6 और 1.5 फीसद होती है। ...और पढ़ें

पशुओं के चारे के आसन्न संकट को लेकर व्यापक जागरूकता अभियान चला रही सरकार
पशुओं के चारे के आसन्न संकट को लेकर व्यापक जागरूकता अभियान चला रही सरकार

डिजिटल डेस्क, लखनऊ। चंद रोज बाद गेहूं की कटाई होने वाली है। कंबाइन से कटाई के बाद खेतों में ही फसल अवशेष जलाने की आम परंपरा रही है। हालांकि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के प्रयासों से इसमें काफी कमी आई है। सरकार पराली जलाने से पर्यावरण, जमीन की उर्वरता आगजनी के खतरे और पशुओं के चारे के आसन्न संकट को लेकर व्यापक जागरूकता अभियान चला रही है। साथ ही फसल अवशेष को सहजने के लिए अनुदान पर कृषि यंत्र इनकी कंपोस्टिंग के के बायो डी कंपोजर भी उपलब्ध करा रही है।

बावजूद इसके अगर गेंहू की कटाई के बाद खरीफ की अगली फसल लेने के बाबत सोच रहे हैं तो रुकिए और सोचिए। आप खेत के साथ अपनी किस्मत खाक करने जा रहे हैं। यह खुद के पांव में कुल्हाड़ी मारने जैसा है। क्योंकि डंठल के साथ फसल के लिए सर्वाधिक जरूरी पोषक तत्व नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश (एनपीके) के साथ अरबों की संख्या में भूमि के मित्र बैक्टीरिया और फफूंद भी जल जाते हैं। भूसे के रूप में पशुओं का हक तो मारा ही जाता है।

फसल अवशेष में है पोषक तत्वों का खजाना

शोधों से साबित हुआ है कि बचे डंठलों में एनपीके की मात्रा क्रमश: 0.5, 0.6 और 1.5 फीसद होती है। जलाने की बजाए अगर खेत में ही इनकी कंपोस्टिंग कर दी जाय तो मिट्टी को एनपीके की क्रमश: 4 , 2 और 10 लाख टन मात्रा मिल जाएगी। भूमि के कार्बनिक तत्वों, बैक्टिरिया फफूंद का बचना, पर्यावरण संरक्षण और ग्लोबल वार्मिग में कमी बोनस होगा। अगली फसल में करीब 25 फीसद उर्वरकों की बचत से खेती की लागत में इतनी ही कमी आएगी और लाभ इतना ही बढ़ जाएगा।

गोरखपुर एनवायरमेंटल एक्शन गु्रप के एक अध्ययन के अनुसार प्रति एकड़ डंठल जलाने पर पोषक तत्वों के अलावा 400 किग्रा उपयोगी कार्बन, प्रतिग्राम मिट्टी में मौजूद 10-40 करोड़ बैक्टीरिया और 1-2 लाख फफूंद जल जाते हैं।

उप्र पशुधन विकास परिषद के पूर्व जोनल प्रबंधक डा. बीके सिंह के मुताबिक प्रति एकड़ डंठल से करीब 18 क्विंटल भूसा बनता है। सीजन में भूसे का प्रति क्विंटल दाम करीब 400 रुपए माना जाए तो डंठल के रूप में 7200 रुपये का भूसा नष्ट हो जाता है। बाद में यही चारा संकट का कारण बनता है।

फसल अवशेष के अन्य लाभ

-फसल अवशेष से ढकी मिट्टी का तापमान सम होने से इसमें सूक्ष्मजीवों की सक्रियता बढ़ जाती है,जो अगली फसल के लिए सूक्ष्म पोषक तत्व मुहैया कराते हैं।

- अवशेष से ढकी मिट्टी की नमी संरक्षित रहने से भूमि के जल धारण की क्षमता भी बढ़ती है। इससे सिंचाई में कम पानी लगने से इसकी लागत घटती है। साथ ही दुर्लभ जल भी बचता है।

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