लखनऊ, [मुहम्मद हैदर]। रिश्तों में दरार के लिए एक वजह ही बहुत है तो बचाने के भी सिर्फ एक कोशिश काफी है। ऐसे ही एक मुमकिन कोशिश परिवार परामर्श केंद्र कर रहा है। पारिवारिक झगड़ों को निपटाकर दंपतियों के दिलों में पड़ी दरार को मिटाने के लिए परिवार परामर्श केंद्र मददगार साबित हो रहा है। एक-दूसरे से अलग जिंदगी बिताने का फैसला लेने के बाद फैमिली कोर्ट में तलाक की पहल कर चुके दंपतियों की काउंसिलिंग कर सात जन्मों का बंधन माने जाने वाले रिश्ते को बचाने की कोशिशें कामयाब हो रही है।

केंद्रीय समाज कल्याण बोर्ड, नई दिल्ली द्वारा अनुदानित केंद्र के काउंसलर मामले की गंभीरता को समझा पति-पत्‍नी और उनके घरवालों से बातचीत कर बीच का रास्ता निकाल टूटने के कगार पर पहुंच चुके उनके रिश्ते को बचाने का काम कर रहे हैं। केंद्र में ऐसे कई मामले दर्ज है, जिनमें पति-पत्‍नी ने तलाक के आवेदन किया था, लेकिन काउंसिलिंग के बाद दोनों में मामले को वापस ले लिया। इस पूरी प्रक्रिया में महिला थाना और फैमिली कोर्ट के वकील भी परिवार परामर्श केंद्र की सहायता करते हैं।

निश्शुल्क काम कर रहे क्षेत्रीय प्रतिनिधि

पारिवारिक झगड़ों को पता कर उनको निपटाने के लिए केंद्र ने शहर भर में अपने क्षेत्रीय प्रतिनिधि बनाए हैं। यह क्षेत्रीय प्रतिनिधि निश्शुल्क काम करते हैं। लखनऊ में करीब 15 क्षेत्रीय प्रतिनिधि हैं। इन प्रतिनिधियों द्वारा तलाक के मामले केंद्र में आते हैं, फिर इसके बाद काउंसलर वर-वधु दोनों पक्षों को नोटिस जारी कर बातचीत शुरू करता है। जो पक्ष बातचीत के लिए राजी नहीं होते, तो पुलिस और वकील की सहायता से उनको कानून नोटिस भेज केंद्र में तलब किया जाता है। फिर मामला की जड़ में जाकर उसको काउंसलर दूर करते हैं।

लोगों को जागरूक कर रही मुहल्ला गोष्ठी

हर माह शहर के विभिन्न इलाकों में केंद्र की ओर से मुहल्ला गोष्ठी का आयोजन किया जाता है। मुहल्ला गोष्ठी में उस इलाके के पारिवारिक झगड़ों के बारे में तफ्तीश होती है, फिर वहां रहने वाले पक्ष से बातचीत कर आगे की प्रक्रिया शुरू होती है। साथ ही लोगों को घरेलू ¨हसा के प्रति जागरुक किया जाता है। इसके अलावा इलाके के क्षेत्रीय प्रतिनिधि व वकील भी पारिवारिक झगड़ों में समझौता कराने के लिए केंद्र में मामले देते हैं। इसके अलावा हर तीन माह में समीक्षा बैठक होती है।

क्या कहते हैं काउंसलर ?

परिवार परामर्श केंद्र काउंसलर आरएम भटनागर का कहना है कि केंद्र में पंजीकृत मामलों में सबसे पहले पारिवारिक कलह के कारणों के बारे में मालूमात हासिल की जाती है। फिर दोनों पक्षों के घर जाकर उनसे बातचीत के जरिए समस्या को सुलझाने की कोशिश की जाती है। बाद में मनोवैज्ञानिक परामर्श के साथ कानूनी सहायता दी जाती है।

केस - 1 

पत्नी ने अपने पति पर धारा 498 ए के तहत दहेज उत्पीड़न का मुकदमा कर तलाक की पेशकश कर दी थी। मामला कोर्ट में लंबित था पर शुरुआती तारीखों में ही पत्‍नी ने पति के खिलाफ दी तहरीर को वापस ले लिया। बाद में पता चला कि पिता ने अपनी बेटी पर तलाक के लिए दबाव बनाया था। काउंसलिंग के बाद जब उसको इस बात का अहसास हुआ तो अपनी शिकायत वापस ले ली।

केस - 2 

शादी के कुछ दिन ही बीते थे कि पति-पत्‍नी में तलाक की नौबत आ गई। दोनों ने एक-दूसरे से अलग होने का फैसला कर लिया। सास से रिश्ता बेहतर न होने की वजह से बेटे ने भी अपनी पत्नी को तलाक देना ही बेहतर समझा पर काउंसिलिंग के बाद समस्या का हल निकाल पत्‍नी और सास को रहने के लिए अलग-अलग घर के साथ प्रतिमाह गुजारा भत्ता तय कर दिया गया। सास-बहू के बीच लिखित समझौता कराया गया।

 

Posted By: Anurag Gupta

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