लखनऊ, जेएनएन। समय के साथ-साथ हमारी संस्कृति में भी बदलाव आया है। सिनेमा और साहित्य में भी यह परिवर्तन देखा जा सकता है। बदलते समय में हमें आधुनिक बनना जरूरी है, लेकिन अपनी संस्कृति और विरासत को छोडऩा सही नहीं। यह बातें प्रदेश के उपमुख्यमंत्री डॉ. दिनेश शर्मा ने कहीं। बुधवार को वह डॉ. राम मनोहर लोहिया राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय में तीन दिन से चल रहे 'शब्द रंग' साहित्य महोत्सव में मुख्य अतिथि के रूप में मौजूद रहे। महोत्सव में 'सिनेमा और समाज', 'मीडिया और संस्कृति', 'साहित्यकारों की दृष्टि में भविष्य का भारत', 'कला साहित्य में भारतीय विचार' तथा 'साहित्य आज-कल' आदि साहित्य विषयक सत्रों का संचालन किया गया।

डॉ. दिनेश शर्मा ने कहा कि भारत युवाओं का देश है। नए भारत के निर्माण में युवा अपनी भूमिका सुनिश्चित करें। उन्होंने उत्तर प्रदेश में 2700 नए कौशल विकास केंद्र खोले जाने की घोषणा की, जिससे युवाओं को अधिकाधिक रोजगार मिल सके। भाषा संस्थान के कार्यकारी अध्यक्ष डॉ. राजनारायण शुक्ल ने हिंदी भाषा के प्रतिष्ठित 14 साहित्यकारों को उ.प्र. भाषा सम्मान, शब्द शिल्पी सम्मान तथा भाषा मित्र सम्मान प्रदान किए। इनमें डॉ. महेंद्र अग्रवाल, डॉ. रचना शर्मा, डॉ. प्रियंका सिंह, पूनम सिंह, अब्दुल रहीम, सर्वेश सिंह, पुनीत बिसारिया, सतपाल शर्मा, प्रभाकर सिंह, गोविंद पांडे, आशुतोष भटनागर, डॉ. हरि शरण मौर्य आदि को सम्मानित किया गया।

 मुख्य वक्ता अभाविप के राष्ट्रीय सह संगठन मंत्री श्रीनिवास ने कहा कि संवेदना जागृत करना ही सही मायने में साहित्य सृजन है। कहा कि अनुभव जब अनुभूति में बदलता है तो वह साहित्य बन जाता है। भारत माता के चरणों में बैठकर ही श्रेष्ठ भारत का निर्माण हो सकता है। विशिष्ट अतिथि बीबीएयू के कुलपति प्रो. एनएमपी वर्मा ने कहा कि भूमंडलीकरण का अत्यधिक लाभ ङ्क्षहदी को मिला है। वर्तमान प्रतिस्पर्धात्मक परिदृश्य में सफल होने के लिए हिंदी के साथ-साथ अंग्रेजी का ज्ञान भी समय की मांग है।

समापन समारोह से पूर्व साहित्य आज-कल विषय पर आधारित संगोष्ठी का आयोजन किया गया। प्रो. श्रद्धा सिंह ने वर्तमान समय में प्रचलित अश्लील साहित्य पर बोलते हुए प्रकाशकों की भूमिका पर प्रश्नचिन्ह लगाया। उन्होंने लोकमंगल व सामाजिक क्रांति के लिए लिखे जाने वाले साहित्य की आवश्यकता पर बल दिया। प्रो. कुमुद शर्मा ने निर्मल वर्मा का उदाहरण देते हुए कहा कि साहित्य घर है, बिना दीवारों का घर, जहां व्यक्ति पहली बार अपने मनुष्यत्व से साक्षात्कार करता है। साहित्य की साझेदारी केवल अपने वतर्मान से ही नहीं बल्कि अपने अतीत से भी रही है। साहित्य की दुनिया के तीन प्रमुख अंग हैं, जिसमें लेखक, पाठक तथा प्रकाशक आते हैं। आज का साहित्य बाजार को ध्यान में रखकर लिखा जा रहा है। इसके अलावा हिंदी संस्थान के कार्यकारी अध्यक्ष प्रो. सदानंद प्रसाद गुप्त, लविवि केपवन अग्रवाल ने अपने विचार रखे।

इस अवसर पर अभाविप के राष्ट्रीय प्रकाशन एवं प्रशिक्षण प्रमुख मनोजकान्त, हरि बोरिकर, रमेश गडिय़ा, प्रवीण गुंजन, घनश्याम शाही, हरिदेव सिंह, अभिलाष मिश्र, अंशुल श्रीवास्तव, अंकुर गुप्ता, डॉ. प्रवीण सिंह, इंद्रेश शुक्ला, उमेश पाटिल, दया शंकर दुबे आदि शिक्षक व छात्र-छात्राएं मौजूद रहे।

Posted By: Anurag Gupta

डाउनलोड करें जागरण एप और न्यूज़ जगत की सभी खबरों के साथ पायें जॉब अलर्ट, जोक्स, शायरी, रेडियो और अन्य सर्विस