लखनऊ [अम्बिका वाजपेयी]। मंडन में उम्र गुजार जाए खंडन में देर न लगती है, जो बने इमारत वर्षो में वो घंटों में गिर पड़ती है...इन पक्तियों में एक अर्थ छिपा हुआ है। अर्थ यह कि ख्याति और सम्मान पाने के बाद उसे संभालना एक बड़ी चुनौती होती है। इस चुनौती से पार न पाने का खामियाजा तमाम गौरवगाथाओं ने भुगता, जिसमें एक है लखनऊ विश्वविद्यालय। लंबा सफर तय करने के बाद जब कोई संस्थान सफलता और असफलता गिनता है तो जाहिर है वर्तमान ज्यादा चमकदार होना ही सफलता की श्रेणी में आएगा। 

लविवि भी आज उम्र के शतक की दहलीज पर है। यह वो पड़ाव है, जहां निश्चित तौर पर इसका आकलन होगा। आकलन से अनुभूति हुई कि तस्वीर बहुत अच्छी नहीं है। जो ख्वाब वर्ष 1919 में राजा महमूदाबाद ने देखा और उसकी तामीर खास दोस्तों के साथ मिलकर 2020 में की, अब वो ख्वाब इतना हसीन क्यों नहीं। क्या हो गया शंकर दयाल शर्मा से लेकर रितु करिधल की परंपरा को? कलम की जगह परिसर में खाकी और खादी का इतना प्रभाव क्यों? ऐसे तमाम सवालों का जवाब तलाशने के  लिए संवादी के मंच पर बैठीं लखनऊ विश्वविद्यालय के बूते सफलता का शिखर छूने वाली तीन विभूतियां। उत्तराखंड के पूर्व लोकायुक्त और रिटा. जस्टिस हैदर अब्बास रजा, कई विश्वविद्यालयों के कुलपति रहे भूमित्र देव ओर लविवि के पूर्व कुलपति एसपी सिंह। इनसे बातचीत की लविवि के पूर्व छात्र और दैनिक जागरण के संपादक उत्तर प्रदेश आशुतोष शुक्ल ने। उनका पहला सवाल एसपी सिंह से था कि अब वो जमाना क्यों नहीं? एसपी सिंह का कहना था कि हर कालखंड में यह सवाल उठता है कि पहले जैसा दौर क्यों नहीं। दरअसल, बदलाव का अहसास संस्था के भीतर के लोगों को कम होता है और वो उसे बता भी नहीं सकते। दिक्कत यह है कि जिम्मेदार लोग जो कहते हैं, जो मानते हैं, उसे करते नहीं हैं। 

इसके बाद जस्टिस रजा श्रोताओं को लविवि की स्थापना के दौर में लेकर गए। जहां पता चला कि 1919 मेें राजा महमूदाबाद ने कैसे एक आर्टिकल के जरिए कैनिंग कॉलेज को यूनिवर्सिटी बनाने की इच्छा जाहिर की। इसके बाद तत्कालीन गर्वनर सर हरकोर्ट बटलर, राजा महमूदाबाद, हबीबुल्लाह साहब के प्रयासों से अगस्त 1920 को इलाहाबाद विश्वविद्यालय की सीनेट ने प्रस्ताव को सहमति की। दो महीनों बात आठ अक्टूबर 1920 को विधान परिषद ने लविवि की स्थापना संबधी विधेयक पारित किया। ज्ञानेन्द्र नाथ चक्रवर्ती इसके पहले कुलपति थे। हर विभाग में एक से बढ़कर विद्वान प्रोफेसर थे। यहां के अर्थशास्त्र का विभाग स्तर तो लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से बेहतर था। आजादी के बाद भी ख्याति में उत्तरोत्तर वृद्धि होती गई। पुलिस और पीएसी का आमद तक विवि की चौखट तक नहीं हुई। माहौल इतना बढिय़ा कि छात्र-छात्राएं कवि सम्मेलन, ड्रामा और संगीत तक में मिल जुलकर भाग लेते थे और लवलेन घूमने जाते थे।

गुलाम भारत के विवि आजाद थे

अब बारी थी भूमित्र देव की। उन्होंने अपने फेसबुक स्टेटस पर लिख रखा है कि गुलाम भारत के विवि आजाद थे। अपने प्रभावपूर्ण तर्कों से उन्होंने साबित कर दिया कि अब तालमेल नहीं तोलमोल का जमाना है और यही कारण है शैक्षिक संस्था के पराभव का। विवि अपनी संस्कृति और परंपरा भूल चुके हैं। यहीं के एक कुलपति थे केएम मुंशी, जो छात्रों के साथ बैठते थे बात करते थे। यह परंपरा अब कहीं नहीं मिलती। आचार्य नरेंद्रदेव की तो इतनी ख्याति थी कि जब उनको बनारस विवि भेजा गया तो यहां छात्रों ने उनके जाने का विरोध किया तो बनारस में छात्राओं ने उनकी आरती उतारी। आंखों को वीजा नहीं लगता और सपनों की सरहद नहीं होती, इसलिए प्रयास दोनों तरफ से होनी चाहिए। 

संचालक आशुतोष शुक्ल ने एसपी सिंह से पूछा कि परिसर में छात्रों की जगह ठेकेदारों और नेताओं ने कैसे ली तो यह कहकर बचे कि इस सवाल का जवाब तो आज शायद युधिष्ठिर भी न दे पाते। उनकी पीड़ा भी छलकी कि एक  कुलपति कोई निर्णय लेता है तो उसके जाते ही वो निर्णय बदल दिए जाते हैं। सुविधा देने और पाने के लिए नीतियां बनाई गईं। संस्था हित को दरकिनार करते हुए अपनों को खुश किया गया। एक्जक्यूटिव काउंसिल की कार्यप्रणाली भी शुचिता का दावा नहीं कर सकती। 

भगवान हो गए हैं कुलपति

एसपी सिंह से सहमति जताते हुए भूमित्र देव ने इतिहास में ले जाते हुए तिब्बती अनुवाद के हवाले से बताया कि नालंदा विवि की तबाही के बाद राहुल श्रीपद वहां बैठकर 70 छात्रों को पढ़ा रहे थे, वो जिजीविषा क्या किसी प्रोफेसर में है। गोरखपुर विवि का 100 दिन में चौथा या पांचवां कुलपति बनने के बाद उन्होंने कैसे स्थिति संभाली इसका जिक्र करते हुए कहा कि अब तो कुलपति भगवान हो गए हैं वो सिर्फ भक्तों से मिलते हैं। छात्रों से दूरी बनाकर सिर्फ बाबूगीरी करते हुए कार्यकाल काट देने की प्रवृत्ति अच्छे नतीजे कैसे देगी। जस्टिस रजा ने भी आयातित कुलपति को भी बड़ी समस्या बताया। कहा कि ऐसे लोग कुलपति बन गए जो कभी विवि गए ही नहीं। ऐसे लोगों की मोरल अथॉरिटी क्या होगी आप अंदाजा लगा सकते हैं। 

छात्र भी मेधावियों को नेता चुनते थे

जस्टिस रजा साहब ने 1950 की छात्र राजनीति का जिक्र करते कहा कि ऐसे लोगों को छात्र नेता चुना जाता था जो फस्र्ट क्लास पास होते थे। जिनका अकादमिक रिकॉर्ड बेहतर हो वही चुनाव जीतते थे। एसएम जाफर जैसे छात्र नेता थे जिनके लिए खुद सुभाष चंद्र ने अपील की थी। अब जब सदन में रेप के आरोपी बैठे हैं तो छात्र राजनीति में आप कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि ठेकेदार नहीं जीतेंगे।

सवाल भी उठे

पूर्व कुलपति एसपी सिंह से सेमेस्टर सिस्टम लागू करने की वजह और उनके हटते ही उसके विरोध की वजह पूछी गई। एसपी सिंह ने कहा कि विदेश में भी यह सिस्टम लागू है, इसमें कोई बुराई नहीं। हम विश्व स्तरीय विवि बनना चाहते हैं पर उनके मापदंड पालन नहीं करना चाहते। विरोध की वजह उन्होंने नकल न कर पाने को बताया। कटाक्ष करते हुए कहा कि पहले तो पांच सवाल जवाब तो फोन पर बता देते थे अब पांच सौ सवाल फोन पर कैसे बताएंगे।

Posted By: Divyansh Rastogi

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