लखनऊ, [दुर्गा शर्मा]। आंखों ही आंखों में इशारा हो गया, बैठे-बैठे जीने का सहारा हो गया... मुहब्बत कुछ ऐसे ही हुआ करती थी, जो बदलते समय और तकनीकी विस्तार के साथ 'रोमांस' बन गई है। अब चिट्ठियां नहीं लिखी जातीं, वाट्सएप होता है। जवाब का इंतजार नहीं, 'ब्रेकअप' होता है। दिल टूटता नहीं कि अगले ही दिन किसी नये से 'पैचअप' होता है। समय के साथ स्वरूप बदला जरूर है, पर आज भी मुहब्बत कह लो या रोमांस... बड़े काम की चीज है। 'भारतीय रोमांस' सत्र में लेखिका वंदना राग, शुचि सिंह कालरा और अनामिका मिश्रा ने प्रेम के बदलते स्वरूप पर बात की। बोलीं, जितनी इच्छाएं पुरुषों में उतनी ही महिलाओं में भी पर वो बोलती नहीं हैं। स्त्रियों को भी बोलना चाहिए। उनकी इच्छाओं को भी सम्मान मिलना चाहिए। हम इस ओर धीरे-धीरे बढ़ रहे हैं, पर अभी पहुंचे नहीं हैं। सत्र का संचालन सुदीप्ति ने किया।

प्यार, रोमांच और लव को साहित्य में उत्सव की तरह मनाने की अमीर परंपरा की बात के साथ सत्र की शुरुआत हुई। संचालन कर रहीं सुदीप्ति ने कहा कि हम किताबों में प्यार के रोचक किस्से पढ़ते हैं। फिल्मों में 'हैप्पी एंडिंग' वाली प्रेम कहानियां देखते हैं। ये सब बहुत अच्छा लगता है, पर असल तस्वीर कुछ अलग है। समाज में प्यार के खुलेपन की बात आती है तो स्थिति बदल जाती है। प्रेमी जोड़ा आत्महत्या कर लेता है या मार दिया जाता है। इस पर कथाकार वंदना राग ने अपनी किताब 'मोनिका फिर याद आई...' के अंश के साथ अपनी बात शुरू की। उन्होंने कहा, जब स्त्री लिखती है तो खुलकर नहीं लिखती, खासकर ङ्क्षहदी साहित्य में। समाज में व्याप्त असमानता को लेखक भोगते हैं, इसलिए हिंदी साहित्य में इस विषय पर लिखने पर वह बात नहीं आ पाती जो अन्य में होती है। 

शुचि सिंह कालरा ने कहा कि बड़े पर्दे पर नब्बे के दशक का रोमांस देखते हैं तो एक थीम उभर कर आती है। इसमें 'ना' को भी 'हां' समझा जाता है। महिला की मर्जी को कम तवज्जो दिया जाता है, हम लेखन से उसे बदलने की कोशिश कर रहे हैं। हां या ना का फर्क बताने का प्रयास हो रहा है। किताबों के जरिए महिलाओं की जिंदगी में रोमांस का महत्व बता रहे हैं।  

अनामिका मिश्रा ने कहा कि जमाना बदला है, पर हमारी संस्कृति नहीं बदली है। आज भी बहुत कुछ छिपा हुआ है। इस ढकेपन की अपनी खूबसूरती है। टेक्नोलॉजी ने हमें 'वर्बल' बनाया है। लोग बात कर रहे हैं, सवाल पूछ रहे हैं। लेखक किताब के जरिए उत्तर तलाशने में मदद कर रहे हैं।

भारतीय समाज में रोमांस को लेकर बात आगे बढ़ी। वंदना राग ने कहा कि हमारी संस्कृति में शिव-सती की कथा है, सीता-राम का आदर्श है, राधा-कृष्ण का उमंग है। प्रेम उत्सव है। रोमांस किसी भी उम्र में हो सकता है। जब वही रोमांस बरकरार रहता है तो वह मुहब्बत कहलाता है। हमें अपनी तलाश को समझना होगा कि हम कृष्ण वाला प्रेम तलाश रहे या फिर कुछ और...। 

वहीं शुचि सिंह कालरा ने कहा कि रोमांस खत्म हो जाता है। रोमांस और लव दोनों अलग-अलग हैं। रोमांस एक नशा है, जो कुछ समय बाद खत्म हो जाता है। उसके बाद जो रिश्ता टिकता है, उसका आधार विश्वास और जिम्मेदारी आदि होते हैं। अनामिका मिश्रा ने कहा कि समय कोई भी हो, मुहब्बत तो मुहब्बत होती है। आज धैर्य की कमी है। लोग तुरंत परेशान हो जाते हैं। आपस में कोई दिक्कत है तो खुलकर बात करें, तुरंत अलग हो जाना ठीक नहीं। जिससे मुहब्बत करते हैं, उसे एक मौका तो देना ही चाहिए। 

टेक्नोलॉजी से मिल रही मदद

अनामिका मिश्रा ने कहा कि टेक्नोलॉजी ने रोमांस को सहूलियत दी है। हम अपनी बात कहना सीख रहे हैं। टेक्नोलॉजी से मदद मिल रही है। पहले लोग छिपकर फिल्में देखते थे, उपन्यास पढ़ते थे, आजकल ऐसा नहीं है। सोच खुली है। 

प्यार की चाह 'यूनिवर्सल ट्रुथ'

शुचि सिंह कालरा ने कहा कि प्यार की चाह 'यूनिवर्सल ट्रुथ' है। शारीरिक इच्छाएं भी होती हैं। अनामिका मिश्रा ने कहा कि किसको पसंद आएगा कि हम किसी को प्यार कर रहे हैं ओर वो अगले दिन हमें छोड़कर चला जाए। आजकल 'वन नाइट स्टैंड' शुरू हो गया है। एक बार प्यार सबको होता है और दिल भी टूटता है। वंदना राग ने कहा कि प्यार सदाबहार है। इसमें कोई बंधन नहीं है।  

प्रकाशक कहते हैं, मसाला डालो 

अनामिका मिश्रा ने कहा कि रोमांस विषय में लिखने पर उसमें मसाला खोजा जाता है। प्रकाशक कहते हैं, मसाला डालो...। अगर स्टोरी की मांग नहीं है, तो जबरन का मसाला नहीं डालना चाहिए। 

हमारे यहां चीजें ढकी हैं...

एक श्रोता ने प्रश्न किया, खजुराहो और कामसूत्र हमारी ही देन है। फिर भी कहां जाता है कि हम बोल्ड नहीं... ऐसा क्यों? इस पर अनामिका मिश्रा ने कहा कि हमारी परवरिश ऐसी है कि चीजें ढकी रहें तो ही अच्छा है।

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