अपनी जड़ों और परंपराओं को जानना ही 'भारत बोध', जागरण गोष्ठी में बोलीं मालिनी अवस्थी
लखनऊ में आयोजित 'भारत बोध' गोष्ठी में वक्ताओं ने भारत की पहचान को उसकी हजारों वर्ष पुरानी ज्ञान परंपरा, संस्कृति और जीवन-दृष्टि से जोड़ा।
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दैनिक जागरण ऑफिस में हुआ गोष्ठी का आयोजन।
HighLights
भारत बोध: ज्ञान परंपरा, संस्कृति और जीवन-दृष्टि से भारत की पहचान।
मालिनी अवस्थी ने हिंदुत्व को जीवनशैली बताया, जड़ों को जानने पर जोर।
संविधान से परे, भारत की प्राचीनता और धर्म की अवधारणा पर चर्चा।
जागरण संवाददाता, लखनऊ। 'भारत बोध' को देश की सीमाओं, भूगोल या संविधान से समझना संभव नहीं है। भारत की पहचान उसकी हजारों वर्ष पुरानी ज्ञान परंपरा, संस्कृति, जीवन-दृष्टि और सामाजिक चेतना से बनी है।
अपनी इसी विरासत को जानना और उसके प्रति बोध विकसित करना आज की आवश्यकता है, क्योंकि अपनी जड़ों और परंपराओं को जानना ही 'भारत बोध' है। दैनिक जागरण के पूर्व प्रधान संपादक नरेन्द्र मोहन की स्मृति में 'भारत बोध' पर आयोजित गोष्ठी का यही निष्कर्ष है।
जागरण कार्यालय में वक्ताओं ने विस्तार से इस विषय को रेखांकित किया। मुख्य वक्ता पद्मश्री से अलंकृत वरिष्ठ लोक एवं उपशास्त्रीय गायिका मालिनी अवस्थी ने कहा, 'एक समय था, जब मनुष्य खुद को हिंदू बोलने में शर्म करता था। धर्म और गाय की बात नहीं कर सकता था। संस्कृति की बात करने से उसके प्रति एक पूर्वाग्रह, विचार और धारणा तय कर दी जाती थी, लेकिन आज समय बदला है।
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भारत-बोध का सबसे बड़ा बोध यह है कि हम अपने शत्रु को जानें और वह शत्रु है मानसिकता, भारत को न जानने वाली। हम एक हैं, हिंदुत्व दो हैं... हो ही नहीं सकता। हिंदुत्व जीवनशैली है। मैं सावरकर तो हिंदुत्व का शीर्ष प्रतीक मानती हूं, लेकिन ऋषि-मुनि के साथ हमारी-आपकी दादी-नानी, सब हिंदुत्व के प्रतीक हैं।
लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान के मुख्य चिकित्सा अधीक्षक एवं जनरल मेडिसिन विभाग के अध्यक्ष प्रो. डॉ. विक्रम सिंह ने कहा कि भारत बोध संविधान के पहले से शुरू होता है, क्योंकि राष्ट्र बाउंड्री से नहीं लोगों से बनता है। आदि शंकराचार्य ने उत्तराखंड, कनार्टक, गुजरात और ओडिशा में जिन पीठों की स्थापना कर बाउंड्री बनाई, वही आज भारत है।

उन्होंने कहा कि मच बियांड, मच ओल्डर दैन कांस्टिट्यूशन यानी संविधान से कहीं परे, कहीं अधिक पुराना है भारत। शब्दकोश में धर्म और रिलिजन पर्यायवाची हैं, लेकिन हिंदू धर्म है, रिलिजन नहीं। धर्म ईश्वर नहीं देते, बल्कि इसको समाज बनाता है।
दूरदर्शन के कार्यक्रम प्रमुख आत्मप्रकाश मिश्र ने कहा कि 14वीं शताब्दी तक भारत कहां रहा और इसके बाद कहां चला गया? 1498 में वास्कोडिगामा कालीकट के तट पर पहुंचे, बोले- मैंने भारत खोज लिया। मतलब उसके पहले भारत कहीं छुपा हुआ था और उसके बाद क्या हुआ, हम सब जानते हैं। न कोई अलेक्जेंडर ग्रेट थ न अकबर महान। इस देश में हरिश्चंद्र, महात्मा गांधी और राजा राम महान थे। अन्य लोगों को महान मानने से... मैं, मेरा भारतबोध उससे इंकार करता है।
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लखनऊ विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग की प्रोफेसर डॉ. श्रुति ने भारत बोध विस्तार से समझाया- 'भारत' शब्द बना है- 'भा' और 'रत' से। 'भा' माने ज्ञान या प्रकाश और 'रत' माने उसमें लीन रहना। भारत विश्वगुरु व ज्ञानगुरु था और आज भी है। ज्ञान प्राप्त करते रहने की प्रवृत्ति या परंपरा में दूसरों को ज्ञान देना भी शामिल है। उसको जानने और 'बोध' का मतलब होता है 'ज्ञान'। उसी से यह 'भारत बोध' शब्द बना।
