आजमगढ़ की 'ब्लैक पॉटरी' को क्यों कहा जाता है काला सोना? 300 साल पुराना है इतिहास
आजमगढ़ की ब्लैक पॉटरी अपनी 300 साल पुरानी कारीगरी और राख-धुएं से काला रंग देने की अनूठी तकनीक के लिए प्रसिद्ध है।

HighLights
आजमगढ़ की ब्लैक पॉटरी 300 साल पुरानी कला है।
राख और धुएं से काला रंग देने की अनूठी तकनीक।
'वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट' योजना से मिली वैश्विक पहचान।
सचिन शर्मा, लखनऊ। आजमगढ़ का जिक्र ब्लैक पॉटरी के बिना अधूरा रहता है। मुख्य शहर से करीब 15 किलोमीटर दूर निजामाबाद के ये काली मिट्टी के बने बर्तन न सिर्फ भारत बल्कि पूरी दुनिया में आजमगढ़ को पहचान दिला रहे हैं।
प्रतिभाशाली कारीगरों ने राख और धुएं से काला रंग जोड़ने की एक नई तकनीकी खोजी, जिससे यह कला प्रसिद्ध हो गई। आज न सिर्फ भारत बल्कि विदेशों में भी इस कला के लोग दीवाने हैं और कई देशों में इन बर्तनों की डिमांड है।
क्या है इसका इतिहास
आजमगढ़ की ब्लैक पॉटरी का इतिहास लगभग 300 साल पुराना माना जाता है। कहा जाता है कि मुगल सम्राट औरंगजेब के शासनकाल के दौरान गुजरात के कुछ कुम्हार शहर में आकर बस गए थे। उन्होंने मिट्टी और अपनी पारंपरिक कारीगरी के मेल से इस अनूठी शैली को जन्म दिया, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी आज भी जीवित है।

कैसे बनती है ब्लैक पॉटरी
ब्लैक पॉटरी बनाने के लिए विशेष मिट्टी का इस्तेमाल होता है। इसके लिए कारीगर तालाबों से निकाली गई चिकनी मिट्टी का इस्तेमाल करते हैं। कारीगर बर्तनों को आकार देने के बाद उन पर सरसों का तेल और विशेष मिट्टी का लेप लगाते हैं, जिससे उनमें नेचुरल चमक आती है।
इसके बाद कारीगर इसे विशेष तरीके से पकाते हैं। बर्तनों को भट्ठी में पकाते समय धुएं को पूरी तरह अंदर ही बंद कर दिया जाता है। ऑक्सीजन की कमी और धुएं के प्रभाव से बर्तन का रंग गहरा काला हो जाता है।
पकने के बाद कारीगर नुकीले औजारों से बर्तनों पर तरह-तरह की सुंदर नक्काशी करते हैं। फिर इनमें जिंक और पारे का विशेष मिश्रण भरा जाता है, जिससे चांदी जैसी चमकदार नक्काशी उभरकर आती है।

आधुनिक दौर और चुनौतियां
आधुनिक समय में भी आजमगढ़ की ये अद्भुत कला काफी प्रसिद्ध है। यहां के कारीगरों के लिए बेहतर जीवन के लिए यह एक अच्छा साधन है। आज के समय में कारीगर केवल पारंपरिक मटके, सुरही या दीये ही नहीं, बल्कि आधुनिक जरूरतों के हिसाब से फ्लावर पॉट, चाय के कप, डिनर सेट अन्य और सजावटी सामान भी बना रहे हैं।
यूपी सरकार ने इस शानदार कला को 'वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट' योजना के तहत वैश्विक बाजार में नई पहचान दिलाई है, इससे स्थानीय कारीगरों को रोजगार और सम्मान दोनों मिल रहा है। आज निज़ामाबाद के 200 से अधिक अनुभवी कारीगर अपनी पारंपरिक कला को पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवंत रखे हुए हैं। लेकिन बदलते दौर के साथ कारीगरों को अपनी कला में थोड़ा बदलाव करना पड़ा है ताकि आज के माहौल के हिसाब से वह अपनी कला को जीवित रख सकें।
