अयोध्या [रघुवरशरण]। रामनगरी इन दिनों सबसे बड़े विवाद से मुक्ति के जश्न में डूबी हुई है। यह स्वर्णिम दिन उन अधिवक्ताओं के चलते संभव हुआ है, जिन्होंने अदालत में रामजन्मभूमि की प्रबल-प्रभावी पैरवी की। मामला सुप्रीमकोर्ट से निस्तारित हुआ और वहां तक पहुंचते-पहुंचते पैरवी करने वालों में कई अधिवक्ता शामिल हुए पर जिन अधिवक्ताओं ने रामजन्मभूमि के दावे की नींव तैयार करने से लेकर उसे अंजाम तक पहुंचाया, उनमें सर्वजीतलाल वर्मा, रणजीतलाल वर्मा, वीरेश्वर द्विवेदी एवं मदनमोहन पांडेय की भूमिका अहम रही है।

सर्वजीतलाल वर्मा स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और दो बार विधायक भी थे पर उनकी सबसे बड़ी पहचान प्रखर अधिवक्ता के रूप में थी। रामलला के प्रबंधन का प्रभार वापस पाने और उस स्थान की सरबराहकारी हासिल करने के लिए निर्मोही अखाड़ा को अदालत जाने की जरूरत महसूस हुई, तो उसके तत्कालीन महंत रघुनाथदास ने सर्वजीतलाल वर्मा का हाथ थामा।

1959 में निर्मोही अखाड़ा की ओर से रामजन्मभूमि की सरबराहकारी के लिए जो पहला दावा हुआ, उसकी तहरीर सर्वजीतलाल ने ही लिखाई थी। यद्यपि वे 1990 तक रामजन्मभूमि की पैरवी करते रहे पर तब तक उनके पुत्र रणजीतलाल वर्मा सिविल के प्रभावी अधिवक्ता के तौर पर प्रतिष्ठित हो चले थे और उन्होंने पिता से रामजन्मभूमि की पैरवी को भी विरासत में प्राप्त की। वैसे उनका जुड़ाव 1959 से ही इस मामले से था, जब पिता के डिक्टेशन पर उन्होंने वाद-पत्र लिखा। हालांकि तब उनकी वकालत का रजिस्ट्रेशन भी नहीं हुआ था। रजिस्ट्रेशन के बाद वे अधिवक्ता के तौर पर अपना सफर आगे बढ़ाते हुए रामजन्मभूमि की पैरवी के पर्याय भी बनते गए। 1992 में पिता के देहावसान के बाद भी उन्होंने रामजन्मभूमि की दावेदारी को आंच नहीं आने दी। फैसले में रामजन्मभूमि का स्वत्व रामलला में निहित होने के साथ जहां अन्य पक्षकारों के लिए कोई गुंजाइश नहीं बची, वहीं शासकीय ट्रस्ट में निर्मोही अखाड़ा का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जाना उसके लिए कम महत्वपूर्ण नहीं है और इसके पीछे रणजीतलाल वर्मा की वह बहस अहम है, जिसे उन्होंने सिविल कोर्ट से लेकर हाईकोर्ट तक में रखा। 

रामनगरी से ही लगे फैजाबाद शहर के निवासी वीरेश्वर द्विवेदी की गणना बेहद प्रतिभाशाली अधिवक्ताओं में होती रही। उनकी प्रतिभा का सिक्का राममंदिर की दावेदारी में भी चला। उमेशचंद्र पांडेय की जिस याचिका पर तत्कालीन जिला जज कृष्णमोहन पांडेय ने रामजन्मभूमि का ताला खोलने का आदेश दिया, उसके लिए वीरेश्वर द्विवेदी ने ही बहस की थी। सिविल कोर्ट से लेकर हाईकोर्ट तक में उन्होंने रामलला की जमकर पैरोकारी की और अपनी बहस से विपक्षियों तक को चमत्कृत किया। उन्हें मुस्लिम विधि और आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (एएसआई) की रिपोर्ट पर महारत हासिल थी और अपनी जिरह से उन्होंने जहां मस्जिद के दावेदारों के पांव उखाड़े, वहीं एएसआई की रिपोर्ट के उस सार को सामने लाने में कामयाब हुए, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि विवादित ढांचा के नीचे मंदिर था। सितंबर 2010 में हाईकोर्ट का निर्णय आने से कुछ माह पूर्व वे दिवंगत हो गए पर एक जीनियस के तौर पर वे शहर की यादों में जीवंत हैं। उनके अधिवक्ता पुत्र सुधीर द्विवेदी कहते हैं, पिता के तौर पर ही नहीं इतने बड़े विवाद से सफलतापूर्वक मुक्ति दिलाने के लिए भी हम उन्हें कभी नहीं भुला पाएंगे। मदनमोहन पांडेेय के बिना यह सूची अपूर्ण होगी। उनका इस मामले से जुड़ाव 1989 में ही हुआ। उन्होंने रामचंद्रदास परमहंस के वाद सहित रामलला के सखा की ओर से दाखिल वाद की प्रभावी पैरवी की। उन दिनों वे सिविल कोर्ट में ही वकालत किया करते थे पर रामलला की पैरवी के लिए वे हाईकोर्ट तक गए और रामलला की दावेदारी के साथ अपनी भी धाक जमाई। वे यह साबित करने वाले अग्रणी अधिवक्ताओं में रहे कि रामलला का जन्म वहीं हुआ, जहां वे विराजमान हैं। उनकी कामयाबी रामलला के लिए मिले संपूर्ण अधिग्रहीत परिसर से परिलक्षित है। पांडेय इन दिनों प्रदेश के अपर महाधिवक्ता की भूमिका में भी प्रभावी छाप छोड़ रहे हैं। 

तीन पीढिय़ों ने की मंदिर की दावेदारी

निर्मोही अखाड़ा की ओर से रामजन्मभूमि की दावेदारी करने वाले अधिवक्ताओं में एक ही परिवार की तीन पीढिय़ां हैं। सर्वजीतलाल वर्मा, उनके पुत्र  रणजीतलाल वर्मा के बाद उनके पौत्र एवं रणजीतलाल वर्मा के पुत्र तरुणजीत वर्मा भी निर्मोही अखाड़ा के अधिवक्ता रहे हैं। पिता के सहायक के रूप में हाईकोर्ट से लेकर सिविल कोर्ट तक में मामले की पैरवी करते रहे तरुणजीत कहते हैं, इस मामले से जुड़े रहना अधिवक्ता के तौर पर शानदार अनुभव था पर अब आगे बढ़कर हमे ऐसे भारत का निर्माण करना होगा, जो सांप्रदायिक भेद-भाव से ऊपर हो।

 

Posted By: Anurag Gupta

अब खबरों के साथ पायें जॉब अलर्ट, जोक्स, शायरी, रेडियो और अन्य सर्विस, डाउनलोड करें जागरण एप