- आइआइटीआर द्वारा तैयार किए गए ओ-नीर से एक पैसे में शुद्ध होगा एक लीटर पानी

जागरण संवाददाता, लखनऊ

शुद्ध जल हर नागरिक का अधिकार है। भारत जैसे देश में जहां दूषित पानी से हर साल बड़ी संख्या में लोग मर जाते हैं, साफ पानी आज भी लाखों लोगों के लिए सपना ही है। इसकी गंभीरता इससे समझी जा सकती है कि भारत सरकार ने भी इसके लिए चिंता व्यक्त करते हुए बजट में रिवर्स ऑसोमिसस (आर ओ तकनीक) आधारित प्लांट सस्ता करने की घोषणा की है। यह बात दीगर है कि आर ओ सेहत व पर्यावरण के लिए कितना सुरक्षित है यह अभी बहस का मुद्दा बना हुआ है। भारतीय विष विज्ञान अनुसंधान संस्थान (आइआइटीआर) के वैज्ञानिकों ने 'ओ-नीर' नामक ऐसा प्लांट तैयार किया है जो सेहत के लिए सुरक्षित होने के साथ-साथ पर्यावरण हितैषी भी है। इसमें मात्र एक पैसे में एक लीटर पानी को शुद्ध करने की क्षमता है।

आइआइटीआर वैज्ञानिकों के अनुसार ओ-नीर में पानी का शुद्धीकरण नेसेंट आक्सीजन द्वारा होता है। अच्छी बात यह है कि उपचार के बाद भी पानी अगले तीस घंटों तक संक्रमण मुक्त बना रहता है। आइआइटीआर के वैज्ञानिक डॉ.केसी खुल्बे बताते हैं कि ओ-नीर से उपचारित पानी में हर तरह के सूक्ष्मजीवी जैसे प्रोटोजोआ, फंगस, एल्गी, सिस्ट प्रोटोजोआ सभी खत्म हो जाते हैं और पानी बगैर किसी रसायन के उपयोग के ही शुद्ध हो जाता है। दावा है कि ओ-नीर से उपचारित पानी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मानकों जैसे विश्व स्वास्थ्य संगठन व पर्यावरण संरक्षण एजेंसी, संयुक्त राज्य अमेरिका (ईपीए) के मानकों पर खरा होता है। यही नहीं, पानी को शुद्ध करने की अन्य विधियां जैसे क्लोरीन, हाइपोक्लोराइट, यूवी, गामा विकिरण व ओजोन की तुलना में भी अधिक कारगर है।

डॉ.खुल्बे बताते हैं कि ओ-नीर का लाभ लोगों को मिल सके इसके लिए विभिन्न विभागों से संपर्क किया जा रहा है। यही नहीं, इसकी टेक्नोलॉजी लेने के इच्छुक उद्यमी भी संस्थान से संपर्क कर सकते हैं।

सोलर पैनल से भी हो सकता है संचालित

वैसे तो ओ-नीर बिजली से चलता है लेकिन इसे सोलर पैनल से भी चलाया जा सकता है। इसलिए दूरदराज की ग्रामीण इलाकों में भी इसका आसानी से उपयोग किया जा सकता है। घरेलू उपयोग के लिए 10 लीटर क्षमता का उपकरण तैयार किया गया है जबकि बड़े प्लांट को तैयार कराया जा रहा है जो अगले माह तैयार हो जाएगा। डॉ.खुल्बे बताते हैं कि दस लीटर क्षमता वाले घरेलू उपकरण से एक मिनट में एक लीटर पानी उपचारित हो जाता है। ऑनलाइन लगाए जाने वाले बड़े प्लांट से एक घंटे में 500 लीटर पानी तक उपचारित किया जा सकता है।

यह है अंतर

-ओ-नीर से पानी की बर्बादी नहीं होती जबकि आर ओ से एक तिहाई पानी बर्बाद हो जाता है। ऐसे में जबकि दिनोंदिन पानी का संकट गहरा रहा है आर ओ तकनीक कतई उपयुक्त नहीं है।

- आर ओ में पानी को जिस रिवर्स ऑस्मोसिस तकनीक से उपचारित किया जाता है उससे शरीर के लिए जरूरी मिनरल भी समाप्त हो जाते हैं। यही नहीं, ऐसे अच्छे जीवाणु जो सेहत के लिए लाभकारी होते हैं वह भी अलग हो जाते हैं। वहीं, ओ-नीर केवल संक्रमण पैदा करने वाले जीवाणुओं को ही खत्म करता है।

कोट

आरओ तकनीक से बड़ी मात्रा में पानी बर्बाद होता है। यही नहीं, सेहत के लिए भी यह मुफीद नहीं है। बावजूद इसके केंद्र सरकार द्वारा इसके दाम कम कर लोगों को प्रोत्साहित करना पर्यावरण के विपरीत है। वहीं सांसद द्वारा आर ओ का प्रचार भी लोगों को भ्रमित करता है। ऐसे में केंद्र सरकार को चाहिए कि आइआइटीआर द्वारा विकसित ओ-नीर तकनीक को अपनाकर लोगों को शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराए।

डॉ.आर के भार्गव, पर्यावरणविद्

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