लखनऊ। केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने आज लखनऊ विश्वविद्यालय के 57वें दीक्षांत समारोह में कहा कि केवल शिक्षा पाने से जीवन को रचनात्मक दिशा नहीं मिल पाती। यदि ऐसा होता तो उच्च शिक्षा प्राप्त नौजवान आतंकी गतिविधियों में लिप्त नहीं होते। उच्च कोटि की शिक्षा हासिल करके यदि नौजवान आतंकी गतिविधियों में शामिल हो रहे हैं तो उनमें संस्कारों और मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता का अभाव है। आतंकवाद और चरमपंथ का खात्मा शिक्षा के साथ संस्कारों का समावेश कर सकता है।

उन्होंने कहा कि संस्कारों के साथ समावेशित होकर ज्ञान समाज के लिए कल्याणकारी साबित होता है अन्यथा विनाशकारी। शिक्षा से अपेक्षा है कि वह व्यक्ति का समग्र विकास करे। शिक्षा व्यवस्था ऐसी हो जो तन के सुख के लिए धन-धान्य, मन के सुख की खातिर मान-सम्मान व स्वाभिमान, बुद्धि विलास के लिए ज्ञान और आत्मा के सुख के लिए भगवान यानी वैराट्य से साक्षात्कार करा सके। देश को आर्थिक ही नहीं आध्यात्मिक महाशक्ति भी बना सके।

कुलाधिपति की हैसियत से समारोह की अध्यक्षता कर रहे राज्यपाल राम नाईक ने कहा कि आज देश के लगभग 700 विश्वविद्यालयों और 35000 कालेजों में दो करोड़ छात्र पढ़ रहे हैं। उन्हें पीड़ा है इसके बावजूद दुनिया के 200 शीर्ष उच्च शिक्षण संस्थानों में भारत का एक भी संस्थान शामिल नहीं है। देश को अनेक विभूतियां देने वाला लखनऊ विश्वविद्यालय दुनिया के शीर्ष 200 संस्थानों में शुमार हो, यह उनकी अभिलाषा और अपेक्षा है। जब छह वर्ष बाद लखनऊ विश्वविद्यालय स्थापना का शताब्दी वर्ष मनाये तो उसकी कीर्ति देश के सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालय के रूप में हो।

दीक्षांत समारोह में एलएलडी की मानद उपाधि से अलंकृत होने वाले इलाहाबाद उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति डा.धनंजय यशवंत चंद्रचूड़ ने अपने उद्बोधन में कहा कि भारत के नागरिक के रूप में हमें स्वतंत्रता के साथ अपने दायित्वों का भी बोध होना चाहिए। कुछ राष्ट्र इसलिए असफल हुए क्योंकि उनकी आधारभूत संस्थाएं चरमरा गईं। संस्थाएं इसलिए नष्ट हो गईं क्योंकि उनमें असहमति को आत्मसात करने की प्रवृत्ति नहीं थी। उन्होंने कहा कि हम सभी के लिए दुनिया हमारे घरों से शुरू होती है। संस्कारों और मूल्यों की पहली दीक्षा हमें मां देती है। एक व्यक्ति के तौर पर हमारा प्राथमिक मूल्यांकन इस बात पर होता है कि अपने परिवार के सदस्यों के प्रति हमारा व्यवहार कैसा होता है। उन्होंने छात्रों का आह्वान किया कि वे सफलता के लिए शार्टकट न अपनायें।


शिक्षक बने राजनाथ

सियासत में कदम रखने से पहले अध्यापक रहे राजनाथ सिंह सोमवार को लखनऊ विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह के मंच पर शिक्षक की भूमिका में नजर आये। साथ मिलकर और सकारात्मक सोच के साथ काम करने से कितनी अतिरिक्त ऊर्जा मिलती है, छात्रों को इसे उन्होंने गणित के युगपात समीकरण का उदाहरण देकर समझाया। बड़े मन से ही बड़ा सुख प्राप्त किया जा सकता है, छात्रों को यह बताने के लिए उन्होंने वृत्त का उदाहरण दिया। यह कहते हुए कि यदि वृत्त की परिधि बढ़ती जाएगी तो उसका आकार भी बढ़ेगा। उन्होंने छात्रों को घर से निकलने से पहले और वापस आने के बाद माता-पिता और बड़ों के चरण छूने की नसीहत दी। हाय-हैलो से तौबा करने को कहा।


प्रबोधन प्रतियों के साथ डिग्रियां

राज्यपाल राम नाईक ने लखनऊ विश्वविद्यालय के कुलपति डा. एसबी निम्से को निर्देश दिया कि दीक्षांत समारोह में अनुपस्थित चालीस हजार छात्रों को जब डिग्रियां दी जाएं तो उन्हें उसके साथ समारोह में केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह और इलाहाबाद उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति डा.डीवाई चंद्रचूड़ द्वारा दिये गए प्रबोधन की प्रति भी उपलब्ध करायी जाए।


छात्रों को राज्यपाल के चार मूल मंत्र

उपाधियां प्राप्त करने वाले छात्रों के साथ राज्यपाल ने सफलता के वे चार मूल मंत्र साझा किये जो 1954 में बीकॉम पास करते समय उन्हें उनके अकाउंटेंसी के प्रोफेसर ने उन्हें दिये थे। पहला मंत्र है-हमेशा मुस्कुराते रहो। दूसरा-अच्छे काम का गुणगान करो। तीसरा-कभी किसी को छोटा मत समझो, उसकी अवमानना न करो और चौथा-किसी भी काम को हमेशा बेहतर तरीके से करने की सोचो।


पढ़ाई में आगे महिलाएं

राज्यपाल ने यह कहकर चुटकी ली कि राजनीति में भले महिलाएं 33 फीसद आरक्षण के लिए संघर्ष कर रही हैं लेकिन पढ़ाई में वे पुरुषों को पीछे छोड़ रही हैं। समारोह में बंटे 32 में से 22 स्वर्ण पदक छात्राओं को मिले। पढ़ाई में पिछड़ रहे छात्रों को उन्होंने सावधान भी किया।

Edited By: Dharmendra Pandey

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