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रोजी-रोटी देने वाले गन्ने के खेत बने जानलेवा, लखीमपुर के दो दर्जन गांवों में बाघ और तेंदुए का खौफ

Published: Sun, 25 Oct 2026 09:38 PM (IST)

लखीमपुर खीरी के निघासन क्षेत्र में गन्ने के खेत ग्रामीणों के लिए जानलेवा बन गए हैं, जहाँ बाघ और तेंदुए ...और पढ़ें

यह तस्वीर एआई द्वारा बनाई गई है।

यह तस्वीर एआई द्वारा बनाई गई है।

HighLights

  1. गन्ने के खेत बने जानलेवा, बाघ-तेंदुए का खौफ।

  2. निघासन के दो दर्जन गांवों में दहशत का माहौल।

  3. वन विभाग ने 15 तेंदुए रेस्क्यू किए, चिंताएं बरकरार।

विकास दीक्षित'अटल', लखीमपुर। किसानों के लिए खेत जहां रोजी-रोटी का सहारा हैं, वहीं अब वही खेत उनकी जिंदगी के लिए खतरा बनते जा रहे हैं। घर के आसपास खेलते बच्चे हों या फसल की रखवाली करते किसान, किसी को नहीं पता कि गन्ने के खेत से कब तेंदुआ या बाघ निकल आए। जंगल और आबादी के बीच बसे तराई के गांवों में जिंदगी की रफ्तार मानो थम सी गई है।

शाम ढलते ही घरों के दरवाजे बंद होने लगते हैं। बच्चों को अकेले बाहर भेजने में परिजन डरते हैं तो खेतों तक जाने के लिए भी लोग कई बार सोचने को मजबूर हैं। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि परिवार का पेट पालने के लिए खेत में जाना जरूरी है और वहां जाना जान जोखिम में डालने जैसा हो गया है।निघासन क्षेत्र के करीब दो दर्जन गांवों में वन्यजीवों की दहशत ग्रामीणों की दिनचर्या पर भारी पड़ रही है।

बथुआ, नौरंगाबाद, बोझिया, सेमरापुरवा, गुनाखर टांडा, धर्मापुर, मुंशीगढ़, मटैहिया, शीतलापुर, खैरटिया, मंझरा पूरब, गोबिंदपुर, लालबोझी और ओरीपुरवा समेत कई गांवों में लोग खौफ के साये में जी रहे हैं। हाल ही में मझगई रेंज के धर्मापुर मार्ग पर नर-मादा बाघों का कुनबा सड़क और गन्ने के खेत के आसपास दिखाई दिया था। इस तरह की घटनाओं से ग्रामीणों की चिंता और बढ़ गई है।

ग्रामीणों की पीड़ा केवल वन्यजीवों के दिखाई देने तक सीमित नहीं है। उन्हें हर वक्त परिवार की सुरक्षा की चिंता सताती है। खेतों में खड़ी फसल की देखभाल न करें तो मेहनत पर पानी फिरने का डर और खेतों में जाएं तो जान का जोखिम। मजदूरी और खेती पर निर्भर परिवारों के सामने यह दोहरी मार है। दिन में कामकाज के दौरान सतर्क रहना और शाम होते ही घरों में सिमट जाना उनकी मजबूरी बनता जा रहा है। जिन रास्तों से कभी बच्चे बेफिक्र होकर गुजरते थे, वहां अब कदम रखने से पहले आसपास नजर दौड़ानी पड़ती है।

परिवार पर हमला हुआ तो तेंदुए से भिड़ गए सुरजीत

लुधौरी के गोबिंदपुर निवासी सुरजीत सिंह उर्फ जोगा के लिए 26 मार्च 2024 का दिन जिंदगीभर नहीं भूलने वाला है। सुरजीत के मुताबिक, वह अपने भतीजे, भांजे और पिता बलदेव सिंह के साथ घर के बाहर खड़े थे। तभी गन्ने के खेत से निकले तेंदुए ने अचानक हमला कर दिया। परिवार के लोगों को बचाने के लिए सुरजीत तेंदुए से भिड़ गए।

करीब आधे घंटे तक चले संघर्ष में उनका दाहिना हाथ गंभीर रूप से घायल हो गया, जबकि पिता की उंगलियों में भी चोटें आईं।बाद में पशुबाड़े में छिपे तेंदुए को वन विभाग ने पकड़ लिया, लेकिन घटना की दहशत परिवार के लिए लंबे समय तक बनी रही। सुरजीत का कहना है कि उन्हें वन विभाग की ओर से कोई मुआवजा नहीं मिला।

ऐसे में सवाल उठता है कि वन्यजीव के हमले में घायल होने के बाद परिवार को इलाज और रोजमर्रा की जरूरतों के लिए किन मुश्किलों का सामना करना पड़ता होगा। चोट के कारण काम प्रभावित हो तो परिवार की आजीविका पर भी असर पड़ना स्वाभाविक है।

बेटे की चीख सुनते ही तेंदुए से भिड़ गए रमेश

चखरा के जगनपुरवा निवासी रमेश यादव के मुताबिक, उनका बेटा मुंशीगढ़ स्थित अपने घर से लौट रहा था। रास्ते में तेंदुए ने उस पर हमला कर दिया। बेटे की चीख सुनकर रमेश मौके पर पहुंचे और उसे बचाने के लिए तेंदुए से भिड़ गए। उन्होंने बताया कि तेंदुए के हमले में बेटे के शरीर पर कई जगह चोटें आई थीं।यह घटना उस डर को बयां करती है, जिसके साथ ग्रामीण परिवार अपने बच्चों को घर से बाहर भेजते हैं।

माता-पिता के मन में हर समय यही आशंका रहती है कि कहीं रास्ते में कोई वन्यजीव न मिल जाए। बच्चों का स्कूल जाना हो या किसी जरूरी काम से बाहर निकलना, परिजनों की चिंता कम नहीं होती। जिन परिवारों के बच्चे पहले वन्यजीवों के हमलों का शिकार हो चुके हैं, उनके लिए यह डर और भी गहरा है।

पति की जान बचाने के लिए हंसिया लेकर तेंदुए के सामने डट गईं रामरती

मझगई रेंज के बल्लीपुर में धान की कटाई कर घर लौट रहे बुजुर्ग दंपती पर गन्ने के खेत में छिपे तेंदुए ने हमला कर दिया। पति को संकट में देख रामरती हंसिया लेकर तेंदुए के सामने खड़ी हो गईं। करीब दस मिनट तक उन्होंने उसका सामना किया। यह घटना बताती है कि खेतों में काम करने वाले ग्रामीणों को कितनी विकट परिस्थितियों में अपने परिजनों की सुरक्षा करनी पड़ रही है।

फसल की कटाई के बाद घर लौटना भी सुरक्षित न रह जाए तो ग्रामीणों के लिए इससे बड़ी चिंता क्या होगी। खेतों में काम करने वाले लोगों के पास हमेशा ऐसे खतरे से बचने के साधन नहीं होते। कई बार सामने अचानक वन्यजीव आ जाए तो अपनी और परिवार की जान बचाने के लिए उन्हें तत्काल फैसला लेना पड़ता है।

तेंदुए पकड़े गए, फिर भी सवालों के घेरे में सुरक्षा

निघासन की दक्षिण निघासन लुधौरी रेंज व बेलरायां रेंज में अब तक वन विभाग की ओर से 15तेंदुओं को रेस्क्यू कर पकड़ा जा चुका है। इनमें बेलरायां रेंज में सबसे अधिक तेंदुए पकड़े जाने की जानकारी है। वन विभाग कई स्थानों पर कैमरे लगाकर वन्यजीवों की गतिविधियों पर नजर रख रहा है और उनकी लोकेशन के आधार पर पकड़ने की तैयारी कर रहा है।

इसके बावजूद ग्रामीणों के मन में सुरक्षा को लेकर सवाल बने हुए हैं। उनका संकट केवल तेंदुए या बाघ को पकड़ने तक सीमित नहीं है। उन्हें खेतों तक सुरक्षित पहुंचने, बच्चों की आवाजाही, रात में आपात स्थिति से निपटने और हमले के बाद इलाज व मुआवजे जैसी जरूरतों को लेकर भी भरोसेमंद व्यवस्था चाहिए।

वन विभाग ने पिछले छह महीने में निघासन और बेलरायां रेंज से 15 तेंदुओं का सफल रेस्क्यू किया है।इसमें पीलीभीत, पूरनपुर,इटावा जंगल सफारी,लखनऊ चिड़ियाघर के अलावा तेंदुओं को उनके प्राकृतिक निवास में छोड़ने का काम भी किया है।प्रभावित क्षेत्रों में वन विभाग की टीमें लगातार निगरानी कर रही है।-मनोज तिवारी, एसडीओ

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