लखीमपुर : मीरा, सुमनलता, मालती, सावित्री, रेखा और सरिता। ये नाम महिला किसानों के हैं। अपने प्रयोगों और किसानी के हुनर से इन्होंने पुरुषों की बहुलता वाले कृषि कार्यो में खुद को साबित और स्थापित किया है। वे स्वावलंबन के हल से न सिर्फ आजीविका की खेती कर रही हैं, बल्कि पति व परिवार पर निर्भरता को त्याग दी हैं।

लखीमपुर में जब प्रगतिशील महिला किसानों की बात होती है तो निघासन तहसील के गांव भिडोरी की चर्चा अवश्य छिड़ती है। यहां की महिला किसानों ने जहर मुक्त खेती करने को प्रेरित किया है। वह खुद कीटनाशक दवाओं की बजाय जैविक तरीके अपनाती हैं। यह सब संभव हो सका महिला किसान मीरा के प्रयासों से। आठवीं तक ही पढ़ीं मीरा प्रयोगों में परास्नातक सरीखी हैं।

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समूह से चढ़ी सफलता की सीढ़ी :

खेती से गुजारा नहीं हो रहा था। पति गांव से बाहर मजदूरी करने निकल गए और खेती की कमान मीरा ने खुद संभाली। खेती की जरूरतों को पूरा करने के लिए मीरा ने ज्योति प्रेरणा स्वयं सहायता समूह बनाया और उसमें गांव की 10 महिलाओं को जोड़ा। फिर महिलाओं को वर्मी कंपोस्ट और जैविक कीटनाशक दवाओं को बनाने के लिए प्रशिक्षण दिलवाया। अब महिलाएं वर्मी कंपोस्ट, अजोला और जैविक कीटनाशक दवाएं बना रही हैं। महिलाएं स्वनिर्मित खाद और कीटनाशक दवाओं का प्रयोग अपने खेतों में करती हैं। इससे उनकी लागत कम हुई और मुनाफा बढ़ा। समूह की महिलाएं गांव-गांव जाकर दूसरी महिला किसानों को वर्मी कंपोस्ट खाद व कीटनाशक दवा बनाने का प्रशिक्षण देती हैं।

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उत्पादकता के साथ बढ़ रहा भूजल स्तर

इस क्षेत्र की प्रशिक्षित महिलाएं अब गांव-गांव जाकर जैविक खेती के लिए लोगों को प्रेरित कर रही हैं। मीरा कहती हैं कि इससे फसलों की उत्पादकता में वृद्धि के साथ-साथ भूजल स्तर में बेहतर होता है। जैविक खेती के अभियान में मीरा के साथ विद्यावती, लज्जावती, गुड्डी और पूनम भी योगदान दे रही हैं।

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