लखीमपुर : विकास के साथ समाज में दिव्यागजन को लेकर सोच बदली है। अब भी एक बड़ा तबका ऐसा है जो शारीरिक अक्षमता की वजह से चलने, बैठने, खाने और बात करने में असमर्थ लोगों को अपनाने में हिचक रखता है। इसमें कई बार परिवार की उदासीनता भी शामिल हो जाती है, लेकिन शहर के मुहल्ला काशीनगर की दिव्यांग मंजुला श्रीवास्तव ने उनके दर्द को महसूस किया और शिक्षित बनाने की मुहिम छेड़ दी। इसमें उनके पति प्रमोद श्रीवास्तव ने भी उनका साथ दे रहे हैं।

मंजुला बताती हैं कि उनके लिए ये बच्चे अनमोल है। शहर से नौ किलोमीटर दूर देवकली में दिव्यांग बच्चों को शिक्षा देने के लिए वर्ष 1992 में दिव्यांग स्कूल खोला गया। इसकी साक्षरता से शुरुआत की गई। पास पड़ोस के ग्रामों से पहले वर्ष 65 बच्चे तलाश कर निशुल्क शिक्षा देनी शुरू की गई। शिक्षा और खेल से जोड़कर दिव्यांग बच्चों को समाज की मुख्यधारा के साथ जोड़ने का काम किया है। विद्यालय में बच्चों को पढ़ाने के लिए जो शिक्षक रखे गए। जिनका पारिश्रमिक मंजुला श्रीवास्तव के पति प्रमोद देते हैं। शुरुआती दौर में स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों को पुरानी किताबें तलाश कर दी गईं। वर्ष 2008 में बच्चों की संख्या बढकर 150 हुई। बेसिक शिक्षा विभाग से इसी वर्ष विद्यालय को कक्षा पांच तक की मान्यता मिली है। वर्ष 2010 से विद्यालय के बच्चों को किताबें व यूनीफार्म उपलब्ध कराई जा रही है। मंजुला बताती हैं कि गांवों के लोग अपने बच्चों को बहुत ही खराब हालत में लाते हैं। इनमें से दिव्यांग बच्चों को साफ-सफाई के बारे में बताया जाता है। ये बच्चे साधारण सी बातें भी नहीं जानते। जैसे टॉयलेट कैसे जाना है, नहाना कैसे है, खाना कैसे खाते हैं। इनमें से कुछ बच्चे तो चम्मच भी सही तरीके से नहीं पकड़ सकते। दिव्यांग बच्चों को सामान्य की तरह बालीवाल, कुर्सी दौड़, खोखो, जूडो और योगा के साथ निबंध प्रतियोगिताएं भी आयोजित कराई जाती हैं।

Posted By: Jagran

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