कौशांबी के कड़ा धाम में Google को भी मात देता है पोथियों में दर्ज पुराना इतिहास, जहां औरंगजेब ने टेका था माथा
कौशांबी के कड़ा धाम में पंडा परिवारों की सदियों पुरानी पोथी-पत्री पूर्वजों का इतिहास सहेजे हुए है। इनमें मुगलकाल से ...और पढ़ें

गूगल को भी मात देता है पोथियों में दर्ज सदियों पुराना इतिहास।
HighLights
कड़ा धाम में पंडा परिवारों की पोथी-पत्री में इतिहास दर्ज।
मुगलकाल से औरंगजेब के प्रसंग तक का उल्लेख मिलता है।
माता शीतला के दरबार में पूर्वजों की पहचान तलाशते हैं लोग।
मनोज दुबे, कौशांबी। आज के डिजिटल दौर में जब लोग अपने पूर्वजों का इतिहास जानने के लिए गूगल का सहारा लेते हैं, वहीं कौशांबी के कड़ा धाम में पंडा परिवारों की पोथी-पत्री सदियों पुरानी यादों को सहेजे हुए है। मां शीतला की पूजा-अर्चना और सेवा में जुटे 47 पंडा परिवारों के पास ऐसी वंशावलियां हैं, जिनमें पीढ़ियों का इतिहास दर्ज होने की बात कही जाती है।
यहां देश के कोने-कोने से लोग अपने पूर्वजों की जड़ों को तलाशते हुए यहां पहुंचते हैं। जब पोथियों के पन्नों पर उन्हें अपने पुरखों के नाम और परिवार की पुरानी जानकारियां मिलती हैं, तो कई लोग भावुक हो उठते हैं।
अपनों के अतीत से जुड़ने का यह अहसास उनके लिए किसी अनमोल धरोहर से कम नहीं होता। इन पोथियों में मुगलकाल तक के उल्लेख मिलने का दावा किया जाता है। अभिलेखों में औरंगजेब के आगमन का भी जिक्र है।
वहीं, संवत 1881 में अयोध्या के राजा शाह भवानी सिंह, कालाकांकर के राजा दिनेश सिंह, काशी नरेश और रीवा के राजा के मां शीतला के दर्शन के लिए आने का उल्लेख भी मिलता है। कड़ा धाम की ये पोथियां महज पुराने कागज नहीं, बल्कि इतिहास की ऐसी विरासत हैं, जो पीढ़ियों को उनके पूर्वजों, परंपराओं और जड़ों से जोड़ती हैं। बदलते समय में भी इनका महत्व बरकरार है।
अध्यक्ष आत्म प्रकाश पंडा बताते हैं कि अपने पूर्वजों की पहचान तलाशते हुए जब लोग इन पोथियों में अपने परिवार का इतिहास देखते हैं, तो उनके लिए यह पल भावुक कर देने वाला होता है। यह पोथियां केवल पुराने दस्तावेज नहीं, बल्कि पीढ़ियों को उनकी जड़ों से जोड़ने वाली अनमोल धरोहर भी हैं।
जब औरंगजेब के अंहकार ने टेके थे घुटने
मुगल बादशाह औरंगजेब मंदिरों और मस्जिदों में चमत्कारी शक्तियों की परीक्षा लिया करता था। जहां उसे किसी शक्ति का प्रभाव दिखाई देता, वहां वह अपने शाही फरमान में तांबे के पत्र पर आराजी माफी अर्थात भूमि दान का उल्लेख करवाता था। ऐसी ही मान्यता माता शीतला कड़वासिनी के दरबार से जुड़ी है।
लोककथा के अनुसार, औरंगजेब ने माता की शक्ति की परीक्षा लेने का निर्णय किया। लेकिन उसी रात उसके शरीर पर चेचक के बड़े-बड़े फफोले पड़ गए। इसके बाद उसने माता से क्षमा मांगी और नौ बीघा जमीन दान करने का फरमान जारी किया। यह ताम्रपत्र आज भी पंडा समाज के पूर्वजों के पास सुरक्षित है।
माता शीतला को कहा जाता है चेचक की देवी
कड़ा धाम में मां शीतला के प्रति लोगों की अटूट आस्था आज भी देखने को मिलती है। मान्यता है कि आसपास के गांवों में चेचक को छोटी-बड़ी माता के रूप में पूजा जाता है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि मां के दरबार में सच्चे मन से शीश झुकाने वाले भक्त कभी खाली हाथ नहीं लौटते। मां शीतला पर यहां के लोगों की इतनी आस्था है कि छोटी चेचक व बड़ी चेचक से प्रभावितरोगी के ऊपर जलहरी का जल डालते है तो रोगी ठीक हो जाता है।
