जागरण संवाददाता, कानपुर देहात: कोरोना वायरस संक्रमण ने पांव पसारना शुरू किया तो मानो वक्त ठहर गया। लॉकडाउन में काम धंधे बंद हो गए। दूर परदेस में रोजी-रोटी की जुगाड़ को गए युवा अपने घरौंदों में लौट आए। ढाई माह परिवार के साथ बिताया। अब लॉकडाउन-4 में छूट मिलने के बाद उद्योग शुरू हुए तो फिर बुलावा आने लगा और एक बार फिर वक्त के ट्रैक पर जिंदगी की ट्रेन आगे बढ़ने को तैयार हो गई। वर्षो बाद परिवार के साथ लंबा वक्त बिताने वाले नवल परदेस जाने की तैयारी कर रहे हैं। बार-बार भावुक होते हैं, सोचते हैं न जाएं, लेकिन नहीं जाएंगे तो जिंदगी का पहिया कैसे घूमेगा। आखिर परिवार के खर्चे भी तो संभालने हैं।

रनियां कस्बे के बास करचल गांव निवासी 40 वर्षीय नवल सिंह मध्य प्रदेश के मुरैना में स्थित एक प्राइवेट फैक्ट्री में ऑपरेटर हैं। होली पर घर आए थे। लॉकडाउन में यहीं रुक गए। परिवार में तीन बेटी, पत्‍‌नी नीना देवी और छोटे भाई कैलाश व कमल के साथ वक्त गुजारा। वह कहते हैं कि जाते समय कष्ट होता है, लेकिन घर की जिम्मेदारी कंधों पर है। यहां रहकर तो काम नहीं चल सकता। जाना तो पड़ेगा ही। अब तक साल में दो बार ही कुछ दिनों के लिए आना होता था। ये पहला मौका था जब इतने दिन तक घर रुका। ये समय हमेशा याद रहेगा।

नाहरपुर गांव निवासी दिलीप कुमार भी इन्हीं में से एक हैं। अभी शादी नहीं हुई। बीटेक करने के बाद मुंबई की एक टायर कंपनी में नौकरी कर रहे हैं। लॉकडाउन के समय आ गए थे। घर पर स्वजनों के बीच बीता समय अच्छा गुजरा। अब फिर से बुलावा आ रहा है। कहते हैं कि यह पल जिंदगी का एक अहम हिस्सा बन गया, जो हमेशा याद रहेगा। आर्थिक जरूरतें पूरी करने के लिए जाना तो पड़ेगा ही।

कटरा गांव निवासी संदीप दिल्ली में इंजीनियर हैं। एक रिफाइंड कंपनी में नौकरी करते हैं। कंपनी से फोन आ चुका है और दस दिन में वापस जाना है। इनके बड़े भाई सेना में हैं। बताया कि वह साल में दो-तीन बार ही कुछ दिन के लिए घर आता था। इस बार ज्यादा समय बिताया। इसीलिए वापस जाने का मन नहीं कर रहा, लेकिन नौकरी के लिए जाना ही पड़ेगा।

Posted By: Jagran

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