जिले में ऐसे कई पौराणिक व ऐतिहासिक शिव मंदिर हैं, जहां महाशिवरात्रि और सावन माह में आस्था की भीड़ उमड़ती है। 17 फरवरी को महाशिवरात्रि पर मंदिरों में दूरस्थ स्थानों व आसपास के जनपदों से आने वाले श्रद्धालु भगवान शिव का जलाभिषेक व पूजन करते हैं। शिव मंदिरों की ख्याति जिले में ही नहीं बल्कि आसपास के जिलों तक हैं। बाराबंकी के लोधेश्वर में जलाभिषेक के बाद कांवरिए यहां पर पूजन अर्चन के लिए जुटते हैं।

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दैत्यराज वाणासुर ने कराई थी स्थापना

जिनई स्थित पौराणिक वाणेश्वर महादेव मंदिर लोगों की आस्था का केंद्र है। इतिहास लेखक प्रो. लक्ष्मीकांत त्रिपाठी के अनुसार सिठऊपुरवा (श्रोणितपुर) दैत्यराज वाणासुर की राजधानी थी। दैत्यराज बलि के पुत्र वाणासुर ने मंदिर में विशाल शिवलिंग की स्थापना की थी। श्रीकृष्ण वाणासुर युद्ध के बाद स्थल ध्वस्त हो गया था। परीक्षित के पुत्र जन्मेजय ने इसका जीर्णोद्धार कराकर वाणपुरा जन्मेजय नाम रखा था, जो अपभ्रंश रूप में बनीपारा जिनई हो गया। मंदिर के पास शिव तालाब, टीला, ऊषा बुर्ज, विष्णु व रेवंत की मूर्तिया पौराणिकता को प्रमाणित करती हैं।

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धर्मिक सद्भाव का संदेश देता कपालेश्वर मंदिर

डेरापुर से दो किमी उत्तर में सेंगुर नदी किनारे स्थित कपालेश्वर शिव मंदिर हिंदू-मुस्लिम एकता व सौहार्द का संदेश देता है। मंदिर शिवलिंग व मजार जुड़ी होने से दोनों धर्म के लोगों की आस्था का केंद्र है। मजार को कुछ लोग नीमनाथ की समाधि तो कुछ लोग पीर पहलवान की मजार बताते हैं। 1894 मंदिर का निर्माण पं.कनौजीलाल मिश्र ने कराया। मठ का गुंबद छोटा होने से बाद में ऊपर बड़ा गुबंद बनवाया गया, दोहरे गुंबद वाला यह एकमात्र मंदिर है। यहां हिंदू पूजन करते हैं तो मुस्लिम चादर चढ़ाते हैं।

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सुख व समृद्धि दायक है जागेश्वर मंदिर

शिवली में पांडु नदी किनारे स्थित प्राचीन जागेश्वर मंदिर सुख व समृद्धि का दायक है। पुजारी कृष्णा पुरी ने बताया कि घने जंगल में बंजारों का पड़ाव पड़ा था। उनकी गाय का दूध रोजाना गायब हो जाता था। बंजारों ने चुपके से देखा कि गाय एक निश्चित स्थल पर दूध गिरा देती थी, जिसकी खोदाई कराने पर शिवलिंग निकला, जिसकी स्थापना करा दी गई।

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एकता का प्रतीक है धर्मगढ़ मंदिर

रसूलाबाद थाना परिसर स्थित धर्मगढ़ मंदिर सद्भाव व एकता का प्रतीक है। 1943 में इसरार हुसैन ने स्वप्न के बाद शिव चबूतरे पर मंदिर का निर्माण शुरू कराया था। इसे 1941 में तत्कालीन एसओ नागेंद्र सिंह ने पूरा कराया। यहां सावन माह और महाशिवरात्रि पर्व पर भक्तों की भीड़ जुटती है।

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आस्था का केंद्र महाकालेश्वर मंदिर

वैभव व समृद्धि का केंद्र रहे शाहपुर का अस्तित्व तो नहीं बचा लेकिन राजघराने का उपासना स्थल महाकलेश्वर मंदिर अमरौधा के पास यमुना किनारे अभी आस्था का केंद्र बना है। मंदिर में गदर के दौरान 1857 में झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के अनुचरों ने शरण ली थी। अंग्रेजों द्वारा ध्वस्त कराए गए मंदिर में 1884 में उदासी साधु बाबा जीवनदास जी महाराज ने पुन: प्राण प्रतिष्ठा कराई। संस्कृत के कवि भारवि ने काव्य में इसी महाकलेश्वर का जिक्र किया है।