जागरण संवाददाता, कानपुर : पूरे तेवरों के साथ भाजपा को ललकार रही कांग्रेस चुनावी जंग के मैदान में तो उतर आई, लेकिन अपने मोर्चे-बंकर बना नहीं पाई। भारत बंद के राष्ट्रव्यापी आंदोलन के तहत कांग्रेस ने प्रमुख बाजार भले ही बंद करा दिए हों, लेकिन इस बंदी ने संगठन की कलई जरूर खोल दी। कार्यकर्ता बाजारों में नजर नहीं आए। बड़े नेता संबंधों की दुहाई पर अपनी साख बेशक कुछ बचाने में सफल रहे, लेकिन कार्यकर्ताओं की सक्रियता और आमजन की सहभागिता नजर नहीं आई।

2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को घेरने की पूरी कोशिश कांग्रेस कर रही है। राफेल मामले पर मुखर हुई कांग्रेस ने तुरंत ही पेट्रो पदार्थो की मूल्यवृद्धि को बड़ा मुद्दा बनाकर सोमवार को भारत बंद का ऐलान कर दिया। इस आंदोलन की सफलता के लिए महानगर संगठन के वरिष्ठ पदाधिकारी और पार्टी के सक्रिय नेता तैयारी में जुट गए, लेकिन अब तक चुनाव के लिहाज से खड़े न हो पाए जमीनी संगठन की यहां भी कमी खलती महसूस हुई। भाजपा जहां हर अभियान बूथ स्तर पर चला रही है, वहीं कांग्रेस इतने बड़े आंदोलन को भी वार्ड स्तर तक नहीं उतार पाई। सड़क पर कहीं भी बाजार बंद का आह्वान करते या पुलिस से जूझते कार्यकर्ता नजर नहीं आए। हां, महानगर पदाधिकारी सहित बड़े नेता जरूर अपनी साख बचाने में सफल रहे।

महानगर अध्यक्ष हरप्रकाश अग्निहोत्री की मेहनत प्रमुख बाजारों की बंदी में दिखी, लेकिन इसमें संगठन की बजाय व्यवहार की मुख्य भूमिका थी। व्यापारियों के बीच प्रभाव रखने वाले या व्यापारिक संगठनों से जुड़े कांग्रेसियों ने संबंधों की दुहाई पर बाजार बंद कराए। शहर के बाकी बाजार खुले रहे। कांग्रेस के इस अभियान से जनता कतई नहीं जुड़ी, इसीलिए बाकी बाजार खुले रहे। इससे साफ जाहिर है कि लोकसभा चुनाव के लिए संगठन की जो मजबूती होनी चाहिए, वह अभी नहीं है। बूथ या वार्ड स्तर पर अभी कोई तैयारी नहीं है।

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