कानपुर, जेएनएन। चौबेपुर ब्लाक का बिकरू गांव अपराध और सियासत के 'विकास' का मॉडल है। 2500 की आबादी वाले इस गांव में चार मजरे हैं। एक भी मजरा ऐसा नहीं है, जिसकी हर गली में सीसी रोड और पक्की नाली नहीं बनी हो। प्रधान कोई भी रहा हो, लेकिन सरकार से मिलने वाली राशि कब और किस काम पर खर्च होगी, दुर्दांत विकास दुबे ही तय करता था। इस गांव को 2011 में निर्मल ग्राम पुरस्कार भी मिला था।

बिकरू ग्राम पंचायत में कुल 356 मकान हैं, इसमें 174 मकान बिकरू, 132 मकान डिब्बा निवादा मजरा, 27 घर अतरिया मजरा और 23 मकान यहां कालोनी में हैं। सर्वाधिक आबादी अनुसूचित जाति के लोगों की है, इसके बाद ब्राह्मण और फिर मुस्लिम समाज की। यादव भी हैं, मगर उनकी आबादी बहुत ज्यादा नहीं। पहली बार 1995 में विकास दुबे गांव का प्रधान बना था। तब उसने इस गांव को विकसित करने का वादा किया था। ऐसा उसने किया भी। गांव को विकसित करने के पीछे मकसद भी राजनीतिक था। वह चाहता था कि लोग उसको विकास पुरुष कहें, उसके मॉडल को देखकर ही आसपास के गांवों के लोग भी उसके कहने पर प्रधान चुनें।

सांसद और विधायक का चुनाव भी उसके कहने पर ही करें, ताकि उसे राजनीतिक संरक्षण मिलता रहे। वह अपने मकसद में कामयाब हुआ। बिल्हौर या चौबेपुर सीट से जो भी विधायक रहा, उसने कभी विकास का विरोध नहीं किया, न ही क्षेत्र के सांसद ने ही। सियासी रसूख से ही विकास ने गांव में सीसी सड़क, हर सौ मीटर पर एक इंडिया मार्क टू हैंडपंप, पक्का नाला व नाली का निर्माण कराया। 2010 में गांव निवासी रजनीकांत कुशवाहा प्रधान बने थे, लेकिन कुछ कारणों से वह गांव से पलायन कर गए थे। इसके बाद यहां समिति का गठन किया गया था और विकास के कहने पर पंचायत सदस्य विसुना देवी को प्रधान का कार्यभार दिया गया था। गांव का नाम निर्मल ग्राम पुरस्कार के लिए भेजा गया और यह पुरस्कार गांव को मिला भी।

Posted By: Abhishek Agnihotri

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