कानपुर, जागरण संवाददाता। शरीर में यूरिक एसिड बढऩे पर भी दूध और शाकाहारी प्रोटीन वाले आहार का सेवन कर सकते हैं। विभिन्न अध्ययनों सामने आया है कि दूध व शाकाहारी प्रोटीनयुक्त आहार शरीर से अतिरिक्त यूरिक एसिड को किडनी (गुर्दे) से बाहर निकालते हैं। अभी तक डॉक्टर मरीजों को प्रोटीन डाइट लेने से मना करते थे। यह बात लखनऊ के किंग जार्ज मेडिकल विवि (केजीएमयू) के गठिया रोग विभागाध्यक्ष प्रो. सिद्धार्थ दास ने कही। वह बुधवार को जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज सभागार में इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के कॉलेज ऑफ जनरल प्रैक्टिसनर्स (आइएमए सीजीपी) के 37वें वार्षिक रिफ्रेशर कोर्स में यूरिक एसिड बढऩे से गठिया की समस्या पर जानकारी दे रहे थे।
उन्होंने कहा कि यूरिक एसिड 7 मिलीग्राम या इससे अधिक होने पर हाथ-पैर के जोड़ों में क्रिस्टल बनने से जोड़ों में सूजन और दर्द होने लगता है। इसकी अधिकता से किडनी फेल हो सकती है। टीबी और किडनी ट्रांसप्लांट के बाद चलने वाली दवाओं से भी यूरिक एसिड बढ़ता है। रेड मीट, व्हाइट मीट, अंडा, मछली व नियमित बीयर पीने से यूरिक एसिड बढ़ता है। कोल्ड ड्रिंक में शामिल फ्रक्टोज से यूरिक एसिड तेजी से बढ़ता है। इसके प्रोग्राम डायरेक्टर डॉ. संजय रस्तोगी व चयरपर्सन डॉ. एके गुप्ता, डॉ. समीर गोविल व डॉ. एचएस चावला थे।

यूरिक एसिड बढऩे से हार्ट अटैक का खतरा
नए शोधों में पता चला है कि यूरिक एसिड की अधिकता से किडनी के अलावा हार्ट अटैक का खतरा है। इसलिए यूरिक एसिड बढऩे पर दिल, बीपी व डायबिटीज के मरीज नियमित दवा लेते रहें। यूरिक एसिड के 80 फीसद मरीजों को उच्च रक्तचाप (हाई बीपी) होता है।
जेनेटिक करण भी जिम्मेदार
गठिया दो तरह का है। एक्यूट अर्थराइटिस में अचानक जोड़ों में असहनीय दर्द होता है, जो 24 घंटे में चरम पर पहुंच कर कम होता है। दूसरे केस में जोड़ों में धीरे-धीरे दर्द शुरू होता और गांठ बन जाती है। यूरिक एसिड अधिक बनने के लिए अनुवांशिक कारण भी जिम्मेदार हैं। यूरिक एसिड की दवाएं एक बार शुरू होने पर जीवन भर चलती हैं।
कच्चा दूध सेहत के लिए खतरा
गाय और भैंस का कच्चा दूध पीने वाले सतर्क हो जाएं। यह सेहत के लिए ठीक नहीं है। इसके सेवन से ब्रूसेला नामक बीमारी का संक्रमण हो सकता है। टीबी से मिलती जुलती बीमारी के बैक्टीरिया जानवरों में पाए जाते हैं। कच्चे दूध के माध्यम से शरीर में चले जाते हैं। इसलिए दूध का ठीक से उबाल कर पीना चाहिए। यह जानकारी रोहतक से आए डॉ. ध्रुव चौधरी ने दी।
उन्होंने कहाकि बुखार से जुड़ी 80 फीसद बीमारियां जीव-जंतुओं से आती हैं। इसमें ब्रूसेला, स्क्रपटाइफस, एचआइवी और बैसकुलाइटिस आदि हैं। जो लोग जानवरों के थन से दूध की धार सीधे लेते हैं या कच्चा दूध पीते हैं। उन्हें ब्रूसेला बीमारी हो सकती है। इसमें सिर दर्द, कमजोरी और बुखार की समस्या दूर करने के लिए दवाएं लेनी पड़ती हैं। अगर तीन सप्ताह तक बुखार ठीक नहीं हो रहा तो यह शरीर में टीबी, सूजन, कैंसर या एचआइवी संक्रमण का संकेत है। ऐसे में डॉक्टरों को बुखार को बीमारी नहीं बल्कि लक्षणों के रूप में लेना चाहिए। बुखार के दो फीसद मामलों में कारण नहीं पता चलता है, ऐसे में मरीज की पूरी हिस्ट्री जानना जरूरी है। कार्यक्रम की प्रोग्राम डायरेक्टर डॉ. नंदिनी रस्तोगी व चेयरपर्सन डॉ. आरके लूंबा, डॉ. राजीव कक्कड़, डॉ. अंबिका भाटिया थीं।
साइटोकाइन हारमोन से आता बुखार
वरिष्ठ चेस्ट फिजीशियन डॉ. राजीव कक्कड़ ने कहाकि जब शरीर पर बाहरी बैक्टीरिया या वायरस हमला करते हैं तो मित्र बैक्टीरिया बचाव करते हैं। उनके बीच जंग में साइटोकाइन हारमोन रिलीज होने से बुखार आता है। अगर बुखार में तेज सांस चले, शरीर में लाल चकत्ते, पेशाब कम, कमजोरी, पीलिया और बेहोशी पर फिजीशियन को दिखाएं।
थोरेस्कोपी से फेफड़े की टीबी व कैंसर की पहचान संभव
दिल्ली के जयपुर गोल्डन हास्पिटल के डॉ. राकेश चावला ने कहाकि फेफड़े की झिल्ली में पानी भरना टीबी या कैंसर की निशानी हो सकती है। अब इसका पता लगाना आसान हो गया है। थोरेस्कोपी विधि में छाती के अंदर दूरबीन युक्त उपकरण डालकर जांच की जाती है। समय से बीमारी का पता लगाकर इलाज संभव है। इसका प्रयोग कर लंग्स कैंसर व स्तन कैंसर में हारमोन के रिसेप्टर का पता लगा सकते हैं। दूसरे संक्रमण की जानकारी भी कर सकते हैं। इसकी मदद से फेफड़े का टिश्यू लेकर बायोप्सी जांच से बीमारी की पहचान भी कर सकते हैं। इसके प्रोग्राम डायरेक्टर डॉ. संदीप कटियार व चेयरपर्सन डॉ. एसके कटियार व डॉ. एसके अवस्थी थे।  

Posted By: Abhishek